2.5% ब्याज, 6% महंगाई! अब कहां रखें अपनी बचत?
लेखक
संजीव मेहरोत्रा, महामंत्री, बरेली ट्रेड यूनियंस फेडरेशन
भारतीय अर्थव्यवस्था में एक आम नागरिक की वित्तीय सुरक्षा की बुनियाद उसका बचत बैंक खाता रहा है, लेकिन अब जब भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के ताज़ा बुलेटिन में बताया गया है कि बचत खातों की ब्याज दरें अपने ऐतिहासिक निम्न स्तर पर पहुंच चुकी हैं, तो ये सवाल उठना लाज़मी है। क्या, हमारी सरकार इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम उठाएगी?
क्या कहता है RBI का बुलेटिन?
अक्टूबर 2011 में जब RBI ने बचत बैंक जमा ब्याज दर को विनियमन -मुक्त किया, तब यह उम्मीद थी कि प्रतिस्पर्धा के चलते उपभोक्ताओं को बेहतर ब्याज मिलेगा। लेकिन हकीकत में, सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के बैंकों में नयी जमा राशियों पर ब्याज दरों में लगातार गिरावट देखी जा रही है।
आज के परिदृश्य में, प्रमुख सरकारी बैंकों की ब्याज दरें इस प्रकार हैं
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI): 2.50%
बैंक ऑफ बड़ौदा: 2.70%
बैंक ऑफ इंडिया: 3.00%
महाराष्ट्र बैंक: 2.75%
केनरा बैंक: 2.70%
यूनियन बैंक: ₹50 लाख तक – 2.75%, और ₹1000 करोड़ से ऊपर – 3.40%
ब्याज दरें कम क्यों हो रही हैं?
रेपो दर में कटौती, जब RBI रेपो दर घटाता है, तो बैंकों पर भी जमा दरें घटाने का दबाव बनता है। फंडिंग लागत में कमी बैंक अपने मार्जिन को सुरक्षित रखने के लिए कम ब्याज देते हैं। कम लागत वाले जमा में गिरावट, चालू खाता और बचत खाता जैसे सस्ते स्रोत अब पहले की तरह आकर्षक नहीं रहे। आर्थिक अनिश्चितता बैंक कम ब्याज देकर अपनी परिसंपत्तियों को संरक्षित करने की रणनीति अपनाते हैं।वैकल्पिक निवेश का बढ़ता आकर्षण,SIP, म्यूचुअल फंड, डिजिटल गोल्ड और अन्य नए विकल्प युवाओं की पसंद बनते जा रहे हैं।
आम नागरिक की जेब पर असर
इस गिरावट का सबसे सीधा असर उस मध्यम वर्ग पर पड़ता है, जो अपनी मेहनत की कमाई को सुरक्षित और तरल रखने के लिए बैंक बचत खातों पर निर्भर करता है। ब्याज दरें इतनी कम हो चुकी हैं कि वे महंगाई दर (Inflation Rate) से भी नीचे चली गई हैं, जिससे वास्तविक बचत दर नकारात्मक हो रही है।
क्या कर सकती है सरकार ?
ब्याज दरों की न्यूनतम सीमा तय करना, ताकि नागरिकों की बचत मूल्यहीन न हो। डिजिटल और ग्रामीण बैंकों पर अलग से रेगुलेटरी गाइडलाइंस बनाना। वैकल्पिक सरकारी निवेश योजनाओं को सरल और लाभकारी बनाना। बचत खातों पर ब्याज को आयकर में और राहत देना।
