पद्मभूषण और यश भारती जैसे सर्वोच्च सम्मान प्राप्त करने वाले स्वर्गीय गोपालदास ‘नीरज’, केवल गीतकार नहीं थे, वो युगद्रष्टा कवि थे। उनके गीतों में प्रेम, दर्शन और समाज की सच्चाई का अद्भुत संगम था। उनका गीत “कारवां गुजर गया… गुबार देखते रहे”, ये सिर्फ़ एक पंक्ति नहीं, एक दौर की आत्मा है।
इटावा से लेकर अलीगढ़ तक… और फिर पूरी दुनिया तक
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गोपाल दास नीरज का जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा ज़िले के पुरावली गांव में हुआ था, लेकिन उन्होंने देशभर में हिंदी कविता की मशाल जलाई। इटावा में उनका बचपन बीता, फिर उन्होंने अलीगढ़ को अपना कर्मभूमि बनाया। यहां वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे।
जब कवि बने बॉलीवुड के गीत सम्राट
नीरज जी ने 60 और 70 के दशक में हिंदी सिनेमा को कुछ ऐसे गीत दिए, जो आज भी अमर हैं। उनके लिखे गीत, “लिखे जो ख़त तुझे (शर्मिली), शोखियों में घोला जाए (प्रेम पुजारी), कारवां गुजर गया… (नई उमर की नई फसल), देखती ही रहो आज दर्पण न तुम (उजाला), कल का पथिक हूँ (प्रेम पुजारी) इन गीतों को शंकर-जयकिशन और एसडी बर्मन जैसे संगीतकारों ने संगीतबद्ध किया।
समाजवादियों के दिल में बसे ‘नीरज’
स्व. मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव दोनों ही नीरज जी के प्रबल प्रशंसक थे। अखिलेश यादव ने उन्हें भाषा संस्थान का अध्यक्ष बनाकर राज्यमंत्री का दर्जा दिया। नीरज का समाजवाद और साहित्य से गहरा जुड़ाव था। शनिवार को भी सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी के सोशल मीडिया हैंडल पर श्रद्धांजलि दी।
अंतिम समय तक लिखते रहे इंसानियत की बात
गोपाल दास नीरज ने अंतिम समय तक इंसानियत को पेश करने वाले गीत लिखे। इसमें “अब कोई ऐसा मज़हब चलाया जाए, जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए…”। नीरज जी के शब्द आज भी ज़रूरत बन चुके हैं। नफ़रत से भरे माहौल में प्रेम और शांति की तलाश है। उनका निधन 19 जुलाई 2018 को हुआ। उन्हें फेफड़ों के संक्रमण के चलते दिल्ली के एम्स में भर्ती किया गया था। वे 93 वर्ष के थे। जब साहित्य बाज़ारवाद के नीचे दबता जा रहा है, तब नीरज की कविता हमें मानवीय मूल्य याद दिलाती है। उनके गीतों में जीवन की सच्चाई थी, मोहब्बत थी, और समाज के लिए सोच थी।
