यहां मातम सिर्फ मजहबी नहीं, मुहर्रम एकता का त्योहार”
बांदा/लखनऊ : यूपी के बांदा जिले में 277 साल से मनाया जा रहा मुहर्रम केवल एक मजहबी रस्म नहीं, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता और सांप्रदायिक सौहार्द का ऐसा त्योहार बन चुका है। जिसकी मिसाल आज पूरे देश को प्रेरणा दे सकती है। यह परंपरा शुरू हुई थी एक ब्राह्मण परिवार से, जिसने हजरत इमाम हुसैन की शहादत को धर्म से ऊपर इंसानियत का प्रतीक मानकर मातम की रस्मों को आत्मा से अपनाया।
ब्राह्मण रामा राव से शुरू हुई परंपरा
स्थानीय लोगों ने मीडिया को बताया कि सन् 1750 में पुणे से बांदा आए मराठा ब्राह्मण रामा राव ने ‘राम का इमामबाड़ा’ बनवाया और मुहर्रम की ढाल सवारी शुरू की। उनका मानना था कि कर्बला में इमाम हुसैन और उनके परिजनों की शहादत अन्याय के खिलाफ लड़ाई और इंसानियत की सबसे बड़ी कुर्बानी है। रामा राव के वंशज आज भी नंगे पैर, उपवास रखकर, ज़मीन पर सोकर 10 दिनों तक मोहर्रम मनाते हैं। रात को अंगारों पर चलना और ढाल उठाना उनके लिए तपस्या और भक्ति का प्रतीक है।
आस्था में तपस्या: अलाव पर चलते हैं श्रद्धालु
मुहर्रम की नवमी की रात, जब रामा राव के वंशज और अकीदतमंद अलाव पर चलते हैं, तो फूलों की तरह आग उड़ती है। लोग ‘ढाल उठाकर’ मन्नतें मांगते हैं, और विश्वास रखते हैं कि इमाम हुसैन की आत्मा यहां की हवा में बसती है।
लक्ष्मी और भाऊराम तय्या का योगदान
रामा राव की महिला परिजन लक्ष्मी और परिजन भाऊराम तय्या ने 1765 में दूसरा इमामबाड़ा बनवाया। आज इसे भाऊराम तय्या का इमामबाड़ा कहा जाता है, जहां आज भी मुहर्रम पर हजारों की भीड़ उमड़ती है।
70 फीसद हिंदू समाज की भागीदारी, एकता का पर्व
बांदा का मुहर्रम धार्मिक सीमाओं से ऊपर है। 70 फीसद भागीदारी हिंदू समुदाय की होती है, जो ढाल उठाते हैं, मातम करते हैं और इमाम हुसैन के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। यहां के जुलूस सिर्फ धार्मिक क्रिया नहीं, एकता और प्रेम का प्रदर्शन हैं।
देशभर से उमड़ती है भीड़
हर साल मुहर्रम के दौरान देशभर से हजारों अकीदतमंद बांदा पहुंचते हैं। राम का इमामबाड़ा और भाऊराम तय्या का इमामबाड़ा देश में हिंदू -मुस्लिम सांस्कृतिक संगम का प्रतीक बन चुके हैं। इतिहासकार शोभाराम कश्यप के अनुसार *बांदा में मुहर्रम की परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब की अनमोल मिसाल है।”
