वाराणसी की दो बालिग महिलाओं ने सुरक्षा के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था, जस्टिस गौतम चौधरी ने कहा- स्वेच्छा से साथ रहने वाले बालिगों की स्वतंत्रता और सुरक्षा की रक्षा जरूरी
प्रयागराज: वाराणसी की दो बालिग महिलाओं के समलैंगिक लिव-इन संबंध से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस को सुरक्षा देने का निर्देश दिया है। दोनों महिलाओं ने परिवार और रिश्तेदारों से खतरे का हवाला देते हुए अदालत से सुरक्षा की मांग की थी। न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी की एकल पीठ ने 14 सितंबर 2026 के आदेश में कहा कि दोनों बालिग हैं और अपनी इच्छा से साथ रह रही हैं, इसलिए उनके शांतिपूर्ण सहजीवन में किसी को बाधा डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
दो बालिग महिलाओं ने मांगी थी सुरक्षा
याचिका में दोनों महिलाओं की ओर से कहा गया कि वे अविवाहित और बालिग हैं तथा अपनी स्वतंत्र इच्छा से एक-दूसरे के साथ रह रही हैं। दोनों अलग-अलग धर्मों से संबंधित हैं और समान लिंग की हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनके रिश्ते से परिवार के लोग नाराज हैं और उन्हें अपनी जान-माल की सुरक्षा को लेकर खतरा है। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने अदालत से अनुरोध किया था कि दोनों को शांतिपूर्वक साथ रहने दिया जाए और परिवार या अन्य लोगों की ओर से किसी तरह की बाधा या उत्पीड़न से उनकी सुरक्षा की जाए।
अदालत में दोनों युवतियों के बयान दर्ज हुए
मामले की सुनवाई के दौरान दोनों महिलाएं अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश हुईं। कोर्ट ने उनसे बातचीत कर उनके बयान दर्ज किए। दोनों ने स्पष्ट किया कि वे बालिग हैं और बिना किसी दबाव, भय या अनुचित प्रभाव के अपनी इच्छा से साथ रह रही हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे भविष्य में भी सहजीवन में साथ रहना चाहती हैं। अदालत ने उनके बयानों और परिस्थितियों को देखते हुए उनकी स्वैच्छिक सहमति को महत्वपूर्ण माना।
अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता का सवाल
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि संविधान का अनुच्छेद 14 समानता और अनुच्छेद 21 जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। अधिवक्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय के नवतेज सिंह जौहर फैसले का भी हवाला दिया और कहा कि व्यक्ति की यौन अभिरुचि उसकी निजता और गरिमा से जुड़ी है। अदालत ने अपने आदेश में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि दो बालिग नागरिक अपनी पसंद से साथ रहने का फैसला कर सकते हैं। विवाह को कानूनी मान्यता मिलने या न मिलने से उनकी शारीरिक सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित नहीं हो सकती।
राज्य की ओर से याचिका का विरोध
राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने याचिका का विरोध किया। दलील दी गई कि समलैंगिक संबंधों को भारतीय समाज में व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता नहीं मिली है और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में विवाह को पुरुष और महिला के संबंध के रूप में देखा जाता है। राज्य की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि अपनी पसंद का साथी चुनना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा हो सकता है, लेकिन समलैंगिक संबंध को विवाह जैसी कानूनी मान्यता देना मौलिक अधिकार नहीं है।
परिवार या समाज को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं
अदालत ने दोनों महिलाओं को बालिग और अपने निर्णय को समझने में सक्षम पाया। कोर्ट ने कहा कि यदि दो बालिग व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से साथ रहने का फैसला करते हैं तो परिवार, रिश्तेदार या समाज का कोई अन्य व्यक्ति उनके शांतिपूर्ण सहजीवन में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह की कानूनी मान्यता का अभाव किसी व्यक्ति को बालिग नागरिकों की गरिमा और शारीरिक सुरक्षा में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं देता।
बाधा होने पर पुलिस को सुरक्षा देने का निर्देश
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि दोनों महिलाओं के शांतिपूर्ण साथ रहने में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है तो वे संबंधित पुलिस अधिकारी से संपर्क कर सकती हैं। पुलिस को दोनों की उम्र और उनके स्वैच्छिक रूप से साथ रहने की पुष्टि करने के बाद जरूरत पड़ने पर तत्काल सुरक्षा उपलब्ध कराने को कहा गया है। कोर्ट के इस आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि पुलिस सुरक्षा का निर्देश कानून के तहत किसी वैध जांच या कार्रवाई में बाधा नहीं बनेगा। यानी अदालत ने दोनों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा को संरक्षण दिया है, लेकिन अन्य किसी कानूनी कार्यवाही के अधिकार को समाप्त नहीं किया है।
