भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ पर विशेष, अगस्त क्रांति में महिलाओं, युवाओं और भूमिगत सेनानियों की भूमिका ने स्वतंत्रता संग्राम को निर्णायक मोड़ दिया
डॉ.सुनीलम
पूर्व विधायक
अध्यक्ष – किसान संघर्ष समिति
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 9 अगस्त 1942 वह ऐतिहासिक दिन है, जब महात्मा गांधी के “करो या मरो” के आह्वान ने पूरे देश को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ निर्णायक संघर्ष के लिए खड़ा कर दिया। इसे केवल एक आंदोलन नहीं, बल्कि जनभागीदारी, त्याग और राष्ट्रीय एकता की ऐसी मिसाल माना जाता है, जिसने ब्रिटिश शासन को यह अहसास करा दिया कि भारत पर अधिक समय तक शासन करना संभव नहीं है।8 अगस्त 1942 को बंबई (अब मुंबई) में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया। इसके तुरंत बाद अंग्रेजी सरकार ने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल समेत लगभग सभी शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इसके बावजूद 9 अगस्त को देशभर में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए और तिरंगा फहराकर अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दी। इसी दिन अरुणा आसफ अली ने मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराकर आंदोलन को नई दिशा दी।
अगस्त क्रांति स्वतंत्रता आंदोलन का व्यापक जनआंदोलन

इतिहासकारों के अनुसार अगस्त क्रांति स्वतंत्रता आंदोलन का सबसे व्यापक जनआंदोलन था। सरकारी आंकड़ों में गोलीबारी में लगभग 1,020 लोगों की मौत और 3,200 से अधिक घायल होने का उल्लेख मिलता है, जबकि कई स्वतंत्रता सेनानियों और इतिहासकारों ने वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक बताई है। देशभर में सैकड़ों स्थानों पर पुलिस और सेना ने गोलीबारी की, हजारों लोगों को जेल भेजा गया और व्यापक दमन किया गया। इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें केवल राजनीतिक नेतृत्व ही नहीं, बल्कि छात्र, किसान, मजदूर, महिलाएं और आम नागरिक भी बड़ी संख्या में शामिल हुए।अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी, ऊषा मेहता, माया घोष और वनलता सेन जैसी महिलाओं ने भूमिगत रहकर आंदोलन को गति दी। वहीं डॉ. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी नेताओं ने भूमिगत नेटवर्क और गुप्त रेडियो प्रसारण के जरिए आंदोलन को जीवित रखा।
बच सकते थे देश के विभाजन से
पूर्व विधायक एवं किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष डॉ. सुनीलम का मानना है कि अगस्त क्रांति ने देश में अभूतपूर्व राष्ट्रीय एकता पैदा की थी। उनके अनुसार यदि यह एकजुटता आगे भी बनी रहती, तो देश के विभाजन जैसी त्रासदी से बचा जा सकता था। उनका यह भी कहना है कि 15 अगस्त जहां सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक है, वहीं 9 अगस्त जनशक्ति, जनसंघर्ष और जनक्रांति का प्रतीक दिवस है। डॉ. सुनीलम ने अपने लेख में यह भी उल्लेख किया है कि आज आवश्यकता केवल इतिहास को याद करने की नहीं, बल्कि अगस्त क्रांति के मूल संदेश-राष्ट्रीय एकता, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और जनभागीदारी को वर्तमान पीढ़ी तक पहुंचाने की है।
9 अगस्त जन क्रांति दिवस के रूप में मनाएं
उनका सुझाव है कि 9 अगस्त को जन क्रांति दिवस के रूप में व्यापक स्तर पर मनाया जाए, ताकि स्वतंत्रता आंदोलन के मूल आदर्श समाज में और अधिक मजबूत हो सकें। आज, जब भारत स्वतंत्रता के 79वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है, तब भारत छोड़ो आंदोलन केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, राष्ट्रीय एकता और जनसहभागिता की प्रेरणा का स्थायी स्रोत है। 9 अगस्त हमें याद दिलाता है कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी जागरूक, संगठित और लोकतांत्रिक जनता होती है।
