लखनऊ : उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव तय समय से पहले कराए जाने की चर्चाओं ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव इस साल नवंबर-दिसंबर में कराने की संभावना पर विचार कर रही है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह अगले साल फरवरी में शुरू होने वाली जनगणना का दूसरा चरण बताया जा रहा है।
दरअसल, इन राज्यों में विधानसभा चुनाव सामान्य रूप से अगले साल फरवरी-मार्च में प्रस्तावित हैं। लेकिन इसी दौरान देशव्यापी जनगणना का दूसरा चरण भी शुरू होना है, जो 9 फरवरी से 28 फरवरी तक चलेगा। इस चरण में राज्य सरकारों के लाखों कर्मचारी सामाजिक और आर्थिक आंकड़े जुटाने के काम में लगाए जाएंगे। ऐसे में चुनाव और जनगणना दोनों प्रक्रियाओं के लिए पर्याप्त सरकारी कर्मचारियों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
जानकारी के अनुसार, केवल उत्तर प्रदेश में ही जनगणना के दूसरे चरण के लिए करीब साढ़े पांच लाख कर्मचारियों की जरूरत होगी। वहीं पंजाब में लगभग दो लाख, जबकि उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में करीब 50-50 हजार कर्मचारियों की आवश्यकता पड़ेगी। ऐसे में चुनावी ड्यूटी और जनगणना कार्य एक साथ होने पर प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
सूत्रों के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व ने संभावित स्थिति को देखते हुए अपनी राज्य इकाइयों को पहले से सतर्क कर दिया है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब की भाजपा इकाइयों से जुड़े सूत्रों का दावा है कि पार्टी नेतृत्व ने बूथ कमेटियों के गठन, संगठनात्मक नियुक्तियों और चुनावी तैयारियों को जुलाई के पहले सप्ताह तक अंतिम रूप देने के निर्देश दिए हैं। पार्टी संगठन को हर परिस्थिति के लिए तैयार रहने को कहा गया है। हालांकि उत्तराखंड को इस मामले में कुछ राहत मिल सकती है। बताया जा रहा है कि राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में जनगणना का दूसरा चरण सितंबर में ही पूरा कर लिया जाएगा। ऐसे में वहां चुनाव तय समय पर भी कराए जा सकते हैं। हालांकि इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
उधर, समय से पहले चुनाव की संभावनाओं ने विपक्षी दलों की सक्रियता भी बढ़ा दी है। विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक के नेताओं ने भी इस मुद्दे पर मंथन शुरू कर दिया है। हाल ही में हुई इंडिया ब्लॉक की बैठक में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बीच संभावित समयपूर्व चुनाव को लेकर चर्चा होने की जानकारी सामने आई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि चुनाव तय समय से पहले होते हैं तो सभी दलों को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ेगा। उम्मीदवारों के चयन से लेकर प्रचार अभियान और संगठनात्मक तैयारियों तक हर स्तर पर तेजी लानी होगी।
फिलहाल चुनाव आयोग या केंद्र सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। लेकिन राजनीतिक दलों की बढ़ती सक्रियता और संगठनात्मक तैयारियों ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है। अब सभी की निगाहें केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के अगले कदम पर टिकी हैं, जो आने वाले दिनों में इस पूरे मामले की तस्वीर साफ कर सकता है।
