लेखक
मुहम्मद साजिद
बाबा साहब को सच्ची श्रद्धांजलि केवल माल्यार्पण नहीं, बल्कि उनके विचारों को जीवन में उतारना है। यदि हम सच में उन्हें “सबका” मानते हैं, तो उनके विचारों-विशेषकर सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व को भी स्वीकार करना होगा। क्योंकि, डॉ.बीआर अंबेडकर की जयंती यानि 14 अप्रैल केवल एक तिथि नहीं, बल्कि उस विचारधारा का स्मरण है, जिसने भारत को एक लोकतांत्रिक, समतामूलक और आधुनिक राष्ट्र बनने की दिशा दी।डॉ.अंबेडकर ने जिस भारत की कल्पना की थी। वह केवल राजनीतिक आज़ादी तक सीमित नहीं थी, बल्कि सामाजिक बराबरी, आर्थिक न्याय और मानव गरिमा पर आधारित थी। आज, लगभग आठ दशक बाद सवाल उठता है। क्या हम उस सपने के करीब पहुंचे हैं? मगर, यह जवाब जटिल है, और पूरी तरह संतोषजनक नहीं। दुनिया का सबसे अच्छा और सबसे बड़ा संविधान भारत का है, जिसको तैयार होने में दो वर्ष 11 महीने, 18 दिन का समय लगा था। पूर्व राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में संविधान कमेटी ने 29 नवंबर, 1949 को पंडित जवाहर लाल नेहरू को संविधान की प्रति सौंपी थी। जिस पर विशेषज्ञों ने काफी गंभीरता से चिंतन और मंथन किया गया। इसके बाद 26 जनवरी, 1950 को उम्मीदों के साथ लागू किया गया था। मगर, शायद वह उम्मीदें आज भी अधूरी हैं।
“संविधान” बाबा साहब की अमर विरासत

भारतीय संविधान, जिसकी रचना में डॉ. अंबेडकर की केंद्रीय भूमिका रही। देश को समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व के सिद्धांत देता है। अनुच्छेद (ARTICLE) 14 से 18 तक समानता, अस्पृश्यता उन्मूलन और अवसर की बराबरी की गारंटी दी गई है। भारत में लोकतंत्र की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि सत्ता परिवर्तन चुनाव से होता है। यह बाबा साहब की दूरदृष्टि का सबसे बड़ा प्रमाण है। मगर, लोकतांत्रिक संस्थाओं को किसी तरह का नुकसान न हो। इसके लिए भारतीय संविधान में पृथककरण को अपनाया गया। जिसके विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से अपना कार्य कर सके।
“शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो”
यह केवल नारा नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का सूत्र है। आज हर राजनीतिक दल अंबेडकर का नाम लेता है, उनकी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण करता है, लेकिन असली सवाल है? क्या हम उनके विचारों को आत्मसात कर पाए हैं, या उन्हें केवल प्रतीक बना दिया है? यह आज भी सोचने का विषय है।
“आरक्षण” दया नहीं, प्रतिनिधित्व का अधिकार
चंद लोगों को सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि आरक्षण “विशेष सुविधा” है, जबकि डॉ. अंबेडकर के अनुसार, यह उन वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का संवैधानिक माध्यम है, जिन्हें सदियों तक शिक्षा, सत्ता और अवसरों से वंचित रखा गया। आरक्षण का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा खत्म करना नहीं, बल्कि शुरुआती असमानता को संतुलित करना है।
प्रतीक स्वीकार, विचार नहीं
डॉ.अंबेडकर की जयंती हो या सरकारी दफ्तरों में संविधान के शिल्पकार की तस्वीर लगाना आसान है, लेकिन जातिगत विशेषाधिकारों पर सवाल उठाना कठिन है। लोग इसे वर्तमान प्रतिस्पर्धा के नजरिए से देखते हैं। इतिहास के अन्याय को नजरअंदाज कर देते हैं। हर सियासी दल के नेता अंबेडकर का नाम लेते हैं, लेकिन उनके विचारों पर गंभीर नीति नहीं बनती। मगर, पिछले कुछ वर्षों में लम्बे समय से गुम हो चुकीं सामाजिक- आर्थिक न्याय की लड़ाई ने रफ्तार पकड़ी है।
सामाजिक असमानता अभी भी कायम
कानूनी समानता के बावजूद जमीनी स्तर पर भेदभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। हालांकि, बाबा साहब का सपना केवल आरक्षण नहीं था। डॉ. अंबेडकर का विज़न कहीं अधिक व्यापक था। उन्होंने शिक्षा के माध्यम से सशक्तिकरण, आर्थिक न्याय, समान नागरिक अधिकार, महिला सशक्तिकरण, जाति-व्यवस्था का पूर्ण उन्मूलन, संवैधानिक नैतिकता का पालन था। उन्होंने स्पष्ट कहा “राजनीतिक लोकतंत्र तब तक अधूरा है, जब तक सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र स्थापित न हो।
क्या सपना पूरा हुआ?
आज भी देश के कई हिस्सों में जातिगत भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार, शिक्षा और अवसरों में असमानता जारी है। उच्च शिक्षा तक पहुंच बढ़ी है, लेकिन समान अवसर अब भी चुनौती है। हालांकि, शिक्षा के स्तर में सुधार हुआ है। जिसके चलते भेदभाव में कमी आई है।आर्थिक असमानता और सामाजिक विषमता के बीच लोकतंत्र की आत्मा बार-बार सवालों के घेरे में आती है।
