नई दिल्ली : मिडिल-ईस्ट में लगातार गहराते तनाव का सीधा असर अब भारत की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर दिखाई देने लगा है। मंगलवार, 4 मार्च को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरकर 92.05 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। इससे पहले जनवरी महीने में रुपया 91.98 के स्तर तक कमजोर हुआ था, लेकिन मौजूदा गिरावट ने सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
जानकारों के मुताबिक, मिडिल-ईस्ट में जारी युद्ध और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने रुपए पर जबरदस्त दबाव बना दिया है। खासतौर पर इजराइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ा दी है, जिसका असर सीधे उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर पड़ रहा है।
इस साल 2% से ज्यादा टूट चुका है रुपया
एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब तक मिडिल-ईस्ट में हालात सामान्य नहीं होते, तब तक रुपए में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। इस साल अब तक रुपए में 2 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की जा चुकी है, जिससे यह 2026 में उभरते बाजारों की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी में शामिल हो गया है।
कच्चे तेल ने बढ़ाई परेशानी
रुपये की कमजोरी की सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल मानी जा रही है। मिडिल-ईस्ट में जंग की आशंका के बीच कच्चा तेल करीब 85 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। जैसे ही तेल महंगा होता है, भारत को ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ जाती है और रुपया कमजोर हो जाता है।
सेफ हेवन की ओर भाग रहा निवेश
युद्ध जैसे हालात में विदेशी निवेशक शेयर बाजार और उभरते देशों की संपत्तियों से पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले डॉलर में निवेश कर रहे हैं। इसे सेफ हेवन डिमांड कहा जाता है। डॉलर मजबूत होने का सीधा नुकसान रुपए जैसी मुद्राओं को होता है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली से भारतीय शेयर बाजार पर भी दबाव देखने को मिला है।
महंगाई का डर बढ़ा
तेल की बढ़ती कीमतों से भारत में महंगाई बढ़ने का खतरा भी गहरा गया है। पेट्रोल-डीजल, परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ने से आम उपभोक्ता पर बोझ बढ़ सकता है। इसी आशंका के चलते विदेशी निवेशक फिलहाल भारतीय बाजार से दूरी बना रहे हैं।
पिछले महीने की राहत अब खत्म
पिछले महीने भारत और अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील के बाद ऐसा लग रहा था कि रुपए को कुछ राहत मिलेगी। उस दौरान विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार में निवेश भी बढ़ाया था और रुपए में हल्की मजबूती देखने को मिली थी। लेकिन मिडिल-ईस्ट में जैसे-जैसे तनाव बढ़ा, यह राहत कुछ ही दिनों में खत्म हो गई।
आम आदमी पर क्या पड़ेगा असर?
रुपये की कमजोरी का असर सीधे आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है। विदेश यात्रा और पढ़ाई महंगी: विदेश घूमने या पढ़ाई करने वालों को डॉलर खरीदने के लिए अब ज्यादा रुपए खर्च करने होंगे। इलेक्ट्रॉनिक्स के दाम बढ़ेंगे: मोबाइल, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान महंगे हो सकते हैं, क्योंकि इनके पुर्जे विदेश से डॉलर में आयात होते हैं। पेट्रोल-डीजल महंगे होने की आशंका: अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं, तो पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ सकते हैं।
आगे क्या कह रहे हैं एक्सपर्ट्स?
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में रुपए की चाल पूरी तरह से इजराइल-ईरान संघर्ष और ग्लोबल ऑइल मार्केट पर निर्भर करेगी। जब तक मिडिल-ईस्ट में तनाव कम नहीं होता, तब तक करेंसी बाजार में अस्थिरता बनी रहेगी। हालांकि, उम्मीद जताई जा रही है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) रुपए को ज्यादा गिरने से रोकने के लिए बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है। RBI जरूरत पड़ने पर डॉलर बेचकर रुपए को सहारा देता है, ताकि अचानक गिरावट से अर्थव्यवस्था को झटका न लगे।
आखिर करेंसी की कीमत तय कैसे होती है?
जब डॉलर के मुकाबले किसी देश की मुद्रा कमजोर होती है, तो उसे करेंसी डेप्रिसिएशन कहा जाता है। हर देश के पास फॉरेन करेंसी रिजर्व होता है, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय व्यापार करता है। अगर फॉरेन रिजर्व घटता है, तो मुद्रा कमजोर होती है और अगर बढ़ता है, तो मुद्रा मजबूत होती है। फिलहाल, मिडिल-ईस्ट के हालात और वैश्विक बाजारों की अनिश्चितता के चलते रुपए की राह आसान नहीं दिख रही है। आने वाले दिनों में सभी की नजरें युद्ध की दिशा और RBI के कदमों पर टिकी रहेंगी।
