लखनऊ/फतेहपुर : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई ऐसे क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं।।जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए परदेस की ज़मीन पर अपने प्राण न्योछावर कर दिए, लेकिन समय के साथ उनका नाम इतिहास के हाशिए पर चला गया। ऐसे ही एक गुमनाम लेकिन महान स्वतंत्रता सेनानी थे शहीद हकीम सैयद नुसरत हुसैन साहब, जिनकी शहादत माल्टा (यूरोप) की धरती पर हुई। अब, उनकी कुर्बानी को देश की मिट्टी से जोड़ने की एक ऐतिहासिक पहल की जा रही है।
माल्टा से शहादत की मिट्टी, कोड़ा जहानाबाद में बनेगा स्मारक
माल्टा की एक निजी यूनिवर्सिटी में कार्यरत रिसर्च स्कॉलर उर्फी रज़ा ज़ैदी ने तुर्की दूतावास (Turkish Embassy) के माध्यम से “मारसा टर्किश सेमिटरी, माल्टा” से शहीद हकीम सैयद नुसरत हुसैन की क़ब्र की मिट्टी हासिल की है। इस मिट्टी को उनके पैतृक कस्बे कोड़ा जहानाबाद, ज़िला फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) लाया जा रहा है। यहां शहीद हकीम सैयद नुसरत हुसैन का स्मारक बनाया जाएगा,ताकि आने वाली पीढ़ियां उनकी कुर्बानी को जान सकें और याद रख सकें।
“शहीद-ए-माल्टा” किताब का होगा विमोचन
इसी ऐतिहासिक मौके पर उर्फी रज़ा ज़ैदी द्वारा लिखित पुस्तक “शहीद -ए-माल्टा- हकीम सैयद नुसरत हुसैन”का भी विमोचन किया जाएगा। इस कार्यक्रम में माल्टा और तुर्की सहित कई देशों के राजदूतों, विभिन्न राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों,दारुल उलूम देवबंद के प्रतिष्ठित मदनी परिवार से जुड़े लोगों, और इतिहास व स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े विद्वानों के शामिल होने की संभावना है।
कौन थे शहीद हकीम सैयद नुसरत हुसैन?
हकीम सैयद नुसरत हुसैन साहब कस्बा कोड़ा जहानाबाद, ज़िला फतेहपुर के रहने वाले थे, शेखुल इस्लाम मौलाना महमूद हसन देवबंदी (शेख अल-हिंद) के शागिर्द थे,और खिलाफ़त आंदोलन व भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय सिपाही थे। प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब ब्रिटिश सरकार ने तुर्की ख़िलाफ़त को समाप्त करने की साज़िश रची, तब इसके विरोध में भारत में खिलाफ़त आंदोलन शुरू हुआ।
खिलाफ़त आंदोलन और आज़ादी की साझा लड़ाई
खिलाफ़त आंदोलन का नेतृत्व मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली (अली बंधु) ने किया,जिसे महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन से जोड़कर इस आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नई जान फूंक दी।
रेशमी रूमाल साज़िश और अंग्रेजों की बर्बरता
खिलाफ़त आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय समर्थन दिलाने के लिए शेख अल -हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी तुर्की व अरब गए,मौलाना ओबैदुल्लाह सिंधी को अफ़ग़ानिस्तान भेजा गया। इसी दौरान मौलाना ओबैदुल्लाह सिंधी ने रेशमी रूमालों पर लिखे गए गुप्त पत्र भेजे,जो दुर्भाग्यवश अंग्रेजों के हाथ लग गए। इसी घटना को अंग्रेजों ने “Silk Letter Conspiracy Case” का नाम दिया।
माल्टा की जेल और शहादत
इसके बाद करीब 222 उलेमा गिरफ्तार किए गए, जिनमें शेख अल-हिंद मौलाना महमूद हसन, मौलाना हुसैन अहमद मदनी,हकीम सैयद नुसरत हुसैन,मौलाना उज़ैर गुल पेशावरी सहित कई नाम शामिल थे। 15 फरवरी 1917 को इन्हें मिस्र से होते हुए माल्टा के वरडाला फोर्ट (कुख्यात कॉन्सेंट्रेशन कैंप) भेज दिया गया। यहां अमानवीय यातनाएं दी गईं,अंधेरी, सीलन भरी कोठरियों में रखा गया, लेकिन अंग्रेज हकीम साहब से कुछ भी उगलवा नहीं सके।
“अकेले आज़ाद होने से बेहतर है शहीद होना”
अंग्रेजी हुकूमत ने हकीम साहब को रिहाई का लालच दिया, बशर्ते वे आंदोलन की जानकारी दे दें। इस पर हकीम सैयद नुसरत हुसैन साहब ने जो जवाब दिया, वह इतिहास बन गया,“मैं अकेला आज़ाद होने से बेहतर यहां मरना क़बूल करुंगा,मैं अपने साथियों के बिना रिहा नहीं होना चाहता।” कुछ ही दिनों बाद, अंग्रेजी ज़ुल्म सहते-सहते। हकीम सैयद नुसरत हुसैन माल्टा की धरती पर शहीद हो गए। उन्हें तुर्की खलीफा की सीक्रेट सर्विस के वरिष्ठ अधिकारी अशरफ़ बे ने अपने खर्च पर दफनाया। इतिहास को वापस उसकी जगह दिलाने की कोशिश की। उर्फी रज़ा ज़ैदी की यह पहल गुमनाम शहीद को पहचान दिलाने का प्रयास है। भारत-तुर्की ऐतिहासिक रिश्तों की याद है,और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा।
