चेन्नई : मद्रास हाईकोर्ट के जज जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के खिलाफ विपक्षी सांसदों द्वारा लाए गए महाभियोग प्रस्ताव का देश के पूर्व न्यायाधीशों ने खुलकर विरोध किया है। शनिवार को देश के 36 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने एक खुले पत्र के जरिए इस प्रस्ताव की निंदा की। इससे पहले भी 56 पूर्व जज इस कदम का विरोध जता चुके हैं। इस तरह अब तक कुल 92 पूर्व न्यायाधीश महाभियोग प्रस्ताव के खिलाफ सामने आ चुके हैं।
खुले पत्र में पूर्व जजों ने कहा कि न्यायपालिका पर इस तरह का राजनीतिक दबाव लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सभी सांसदों और देश के नागरिकों को इस प्रस्ताव की निंदा करनी चाहिए, क्योंकि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। पूर्व जजों ने अपने पत्र में देश के चार पूर्व मुख्य न्यायाधीशों दीपक मिश्रा, रंजन गोगोई, ए.एस. बोबड़े और डी.वाई. चंद्रचूड़ का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन पूर्व CJI के खिलाफ भी अलग-अलग समय पर महाभियोग लाने की कोशिशें की गई थीं, लेकिन ऐसे प्रयास लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ रहे हैं। जज संविधान और अपनी शपथ के प्रति जवाबदेह होते हैं, न कि किसी राजनीतिक या वैचारिक दबाव के प्रति।
पूरा मामला मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच के एक फैसले से जुड़ा है। 4 दिसंबर को अदालत ने तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित मंदिर और दरगाह से जुड़े विवाद में हिंदू पक्ष के हक में आदेश दिया था। यह याचिका एक राइट-विंग एक्टिविस्ट द्वारा दाखिल की गई थी। जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने अपने आदेश में सुब्रमण्यस्वामी मंदिर के अधिकारियों को निर्देश दिया था कि दीपाथून पर्व पर शाम 6 बजे तक पहाड़ी पर दीपक जलाया जाए, भले ही दूसरे पक्ष की ओर से इसका विरोध किया जा रहा हो। अदालत ने साफ कहा था कि दीपक जलाने से पास स्थित दरगाह या मुस्लिम समुदाय के अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं होता।
इस आदेश के बाद तमिलनाडु सरकार ने कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जताते हुए इसे लागू करने से इनकार कर दिया। सरकार के इस रुख के बाद ही जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग लाने की मांग तेज हुई। विपक्षी सांसदों ने इसी आधार पर महाभियोग प्रस्ताव पेश किया। तिरुपरनकुंद्रम का धार्मिक महत्व काफी पुराना है। यह स्थान तमिलनाडु के मदुरै से लगभग 10 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है और इसे भगवान मुरुगन के छह प्रमुख निवास स्थलों में से एक माना जाता है। पहाड़ी पर स्थित सुब्रमण्यस्वामी मंदिर छठी शताब्दी का माना जाता है। ऐतिहासिक रूप से यहां की सबसे ऊंची चोटी पर कार्तिगई दीपम जलाने की परंपरा रही है।
17वीं शताब्दी में इसी पहाड़ी पर सिकंदर बदूषा दरगाह का निर्माण हुआ था, जिसके बाद से दीपक जलाने को लेकर विवाद शुरू हो गया। यह विवाद वर्षों से चला आ रहा है और समय-समय पर उग्र रूप भी लेता रहा है। 18 दिसंबर को इस विवाद से जुड़ी एक दुखद घटना भी सामने आई। मदुरै में पूर्णचंद्रन नामक एक व्यक्ति ने पुलिस चौकी में खुद को आग लगा ली। इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस के अनुसार, उसने सुसाइड से पहले एक ऑडियो क्लिप साझा किया था, जिसमें वह दीपक विवाद से परेशान होने की बात कह रहा था।
इस पूरे मामले में पूर्व जजों का मानना है कि महाभियोग का प्रस्ताव न्यायिक फैसलों से असहमति जताने का संवैधानिक तरीका नहीं है। फैसलों की समीक्षा अपील और कानूनी प्रक्रिया के जरिए होती है, न कि महाभियोग की धमकी देकर। अगर इस तरह के कदमों को बढ़ावा दिया गया, तो यह लोकतंत्र और न्यायपालिका की स्वतंत्रता की जड़ों को कमजोर कर सकता है।
