लखनऊ : प्रदेश में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR अभियान इन दिनों पूरे जोश के साथ चल रहा है। लेकिन इस अभियान ने सिर्फ वोटर लिस्ट सुधारने की प्रक्रिया नहीं दिखाई, बल्कि राजनीतिक दलों की जमीनी हकीकत भी खोलकर रख दी है। एक तरफ चुनाव आयोग के बूथ लेवल ऑफिसर, यानी बीएलओ, दिन-रात फॉर्म भरवाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ कई राजनीतिक दल इस प्रक्रिया से लगभग दूरी बनाए बैठे हैं। हालत ये है कि कई बीएलओ अपनी जान जोखिम में डालकर काम कर रहे हैं और अभियान के दबाव में प्रदेश में अब तक आठ बीएलओ अपनी जान गंवा चुके हैं। इनमें से तीन ने तनाव और डर की वजह से आत्महत्या की, जबकि चार बीएलओ की मौत हार्ट अटैक से हुई है। यह सिर्फ एक सूची अद्यतन का काम नहीं, बल्कि सिस्टम के भारी दबाव की भयावह तस्वीर भी है।
बीएलओ और बीएलए, दोनों को चुनावी प्रक्रिया की रीढ़ माना जाता है। बीएलओ पर जिम्मेदारी है वोटर सूची को सही रखना, नाम जोड़ना, हटाना और संशोधित करना, जबकि बूथ लेवल एजेंट यानी बीएलए राजनीतिक दलों की सबसे महत्वपूर्ण इकाई। चुनाव के दौरान यही बीएलए बूथ मैनेजमेंट संभालते हैं, कार्यकर्ताओं को समन्वित करते हैं और मतदाताओं को मतदान केंद्र तक लाने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। कहा जाता है कि जिस दल का बूथ प्रबंधन मजबूत होता है, उसका चुनावी प्रदर्शन भी उतना ही बेहतर होता है। लेकिन SIR अभियान ने दिखा दिया है कि कई दलों का बूथ प्रबंधन कागज़ों में जितना मजबूत दिखाई देता है, जमीन पर उतना कमजोर है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने अभियान शुरू होने से पहले सभी राजनीतिक दलों को निर्देश दिया था कि वे अपने बूथ लेवल एजेंट नियुक्त करें और उनकी सूची आयोग को भेजें। लेकिन जब आंकड़े सामने आए, तो तस्वीर चौंकाने वाली थी। प्रदेश के 1,62,486 बूथों में से सबसे ज्यादा बीएलए भाजपा ने नियुक्त किए 1,59,843। सपा ने 1,42,121 बीएलए लगाए, जबकि बसपा ने 1,38,681। लेकिन इन तीनों के बाद आते हुए कांग्रेस का ग्राफ सीधे नीचे गिर जाता है। कांग्रेस ने सिर्फ 49,121 बूथों पर ही बीएलए लगाए, जो कुल बूथों का मात्र 30 प्रतिशत है। इसका मतलब साफ है कि प्रदेश के लगभग 70 फीसदी बूथ कांग्रेस के एजेंट विहीन हैं। यही नहीं, 17 जिलों जिनमें मथुरा, प्रयागराज, कन्नौज, सुल्तानपुर, शामली, संतकबीर नगर, शाहजहांपुर, औरैया, बहराइच, मऊ सहित कई बड़े जिले शामिल हैं इनमें एक भी बूथ पर कांग्रेस का BLA मौजूद नहीं है। कई जिलों में तो यह संख्या सौ से भी कम है, जैसे इटावा में सिर्फ 35, सोनभद्र में 70, और कुशीनगर में 80।
बसपा की स्थिति भी पूरी तरह मजबूत नहीं है। बसपा ने जहां पूरे प्रदेश के 85 प्रतिशत बूथों पर अपने एजेंट लगाए हैं, वहीं कानपुर नगर एकमात्र ऐसा जिला है जहां बसपा का एक भी एजेंट तैनात नहीं है। सपा की भी एक कमजोर कड़ी सामने आई है। सपा के दिग्गज नेता आजम खां के गढ़ रहे रामपुर जिले में सपा का एक भी बीएलए नहीं है, जबकि पार्टी ने प्रदेश में 87 प्रतिशत बूथों पर एजेंट नियुक्त किए हैं।
SIR अभियान ने साफ कर दिया है कि जहां बीएलओ अपनी जान की परवाह किए बिना इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं, वहीं कई राजनीतिक दलों के बूथ स्तर पर संरचनाएं बेहद कमजोर पड़ चुकी हैं। चुनावी रणनीति चाहे जितनी बड़ी हो, लेकिन बूथों पर खड़े ये छोटे एजेंट ही असली लड़ाई लड़ते हैं, और उसी मोर्चे पर कई दलों के हाथ खाली दिखाई दे रहे हैं।
