इंदौर में शायरी से दिया मुहब्बत का पैगाम, मेरे बस में हो, तो मैं जाऊं ना दुनिया छोड़कर, जब तलक रखना दूं सब टूटे दिल जोड़कर…
बरेली। यूपी की राजधानी लखनऊ में आयोजित रेड एफएम के विशेष कार्यक्रम “द अवैध कनेक्शन” में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शायर एवं बरेली की शान प्रो.वसीम बरेलवी को अवध सम्मान से नवाजा गया। यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने वसीम बरेलवी को उनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया। इस दौरान रेड एफएम के कलस्टर स्टेशन हेड अभिषेक द्विवेदी, प्रोसेसिंग हेड दीपक जोशी, क्लस्टर हेड प्रोसेसिंग सुमिलन आदि मौजूद थे। वाराणसी घराने के कलाकार सौरभ-गौरव मिश्र ने अपनी बेहतरीन प्रस्तुति से शमां बांधा। वसीम बरेलवी की शायरी और साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें विभिन्न मंचों पर सम्मानित किया जाता रहा है, जो उनकी लोकप्रियता और साहित्यिक प्रतिष्ठा को दर्शाता है।
मेरे बस में हो, तो मैं जाऊं ना दुनिया छोड़कर, जब तलक रखना दूं सब टूटे दिल जोड़कर
अंतर्राष्ट्रीय शायर वसीम बरेलवी ने इंदौर में आयोजित एक मुशायरे में कलाम पेश किया। उन्होंने पढ़ा, बढ़ी तो है गली कूचों की रौनक, मगर इंसान तन्हा हो गया है। इसके बाद पड़ा “अपने लिए रोशन किए थे, उजाला दूसरों का हो गया”। मगर, उनके “मेरे बस में हो, तो मैं जाऊं ना दुनिया छोड़कर, जब तलक रखना दूं सब टूटे दिल जोड़कर” सुनकर श्रोता झूम उठे।
मिर्ज़ा ग़ालिब, उर्दू अकादमी अवॉर्ड, और साहित्य भूषण सम्मान से भी सम्मानित
अंतर्राष्ट्रीय शायर वसीम बरेलवी को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। इसमें मिर्ज़ा ग़ालिब अवॉर्ड, उर्दू अकादमी अवॉर्ड, साहित्य भूषण सम्मान शामिल हैं। प्रो. वसीम बरेलवी प्रसिद्ध भारतीय शायर हैं। आपको उर्दू ग़ज़ल और शायरी की दुनिया में अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है। आपका असली नाम ज़ाहिद हुसैन है, लेकिन वसीम बरेलवी के नाम से मशहूर हुए।
शायरी में मोहब्बत के रंग
आपकी शायरी में गहरी सोच, समाज की सच्चाई और मोहब्बत के रंग देखने मिलते हैं। वसीम बरेलवी का जन्म 8 फरवरी 1940 को यूपी के बरेली हुआ था। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की और बाद में रुहेलखंड विश्वविद्यालय में उर्दू साहित्य के प्रोफेसर भी रहे। आपकी ग़ज़लें और शेर आम जनता से लेकर उर्दू के विद्वानों तक को प्रभावित करते हैं। उन्होंने अनेक मुशायरों और साहित्यिक कार्यक्रमों में भारत और विदेशों में भाग लिया है। शायरी में सरलता और गहराई का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
यह हैं प्रसिद्ध शेर
“तू इधर-उधर की न बात कर, ये बता कि क़ाफ़िला क्यों लुटा। मुझे रहज़नों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है।” इसके साथ ही “हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे,कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते।””अपनी पहचान मिटाने को कहा जाता है, हर नए दौर में इक और नया जाता है।”
