नेहरू की मेज़ से ‘मधुशाला’ तक, हरिवंश राय बच्चन की 118 वीं जयंती पर अनसुनी दास्तान
हिन्दुस्तान की ज़बानें सिर्फ़ बोलने का ज़रिया नहीं, बल्कि हमारी तहज़ीब, हमारी रवायत और हमारी रूह की पहचान हैं। उर्दू और हिन्दी की दुनिया में एक जुमला मशहूर है-“तरजुमा अल्फ़ाज़ का नहीं, मिज़ाज का होता है।”1950 के दशक में यही मिज़ाज दो विराट शख़्सियतों- पंडित जवाहरलाल नेहरू और हरिवंश राय बच्चन के बीच एक दिलचस्प, लेकिन बेहद महत्त्वपूर्ण तकरार की वजह बना। इस पूरी कहानी को पत्रकार कल्लोल भट्टाचार्जी ने अपनी किताब “Nehru’s First Recruits” में भी दर्ज किया है, और यह वही दौर था, जब भारत अपनी नई पहचान, नए प्रतीक और नई भाषाई दिशा तय कर रहा था। हरिवंश राय बच्चन की आज 118 वीं यौम-ए- पैदाइश (जयंती) हैं। उन्हें श्रद्धांजलि देने का सिलसिला शुरू हो गया है। उनके योगदान को देश कभी नहीं भूल सकता।
जानिए बच्चन का साहित्य से कूटनीति तक का सफ़र
1955 में हरिवंश राय बच्चन मधुशाला जैसी कालजयी रचना के बाद हिन्दी साहित्य का चमकता नाम थे। इसी वर्ष, नेहरू ने उन्हें भारतीय विदेश सेवा (IFS) में शामिल कराया।
उनकी प्रमुख जिम्मेदारी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के भाषणों का अनुवाद था। एक बार बच्चन ने उपराष्ट्रपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन के संबोधन का अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद किया।
नेहरू ने ड्राफ़्ट पढ़ा और कहा-“डॉ. हुसैन इन कुछ अल्फ़ाज़ का उच्चारण नहीं कर पाएंगे।”इस पर बच्चन का जवाब भाषा–सम्मान का ऐतिहासिक बयान बन गया-“पंडित जी, किसी एक शख़्स की ज़बान-सहूलियत से भाषा नहीं बदली जाती। अगर, ऐसा है, तो आप इसे उर्दू में क्यों नहीं तरजुमा करा लेते?”नेहरू ठहर गए।
भाषा की राजनीति, संवैधानिक मर्यादा और सांस्कृतिक संतुलन- तीनों एक पल में सामने खड़े थे।
संविधान, उर्दू- हिन्दी और भाषणों की बाध्यता
कल्लोल की किताब बताती है कि
भाषण उर्दू में नहीं हो सकता था। क्योंकि भारतीय संविधान राष्ट्रपति/उपराष्ट्रपति के भाषा–प्रयोग को ‘हिन्दी’ तक सीमित रखता है। हालाँकि, हिंदी में उर्दू के कई शब्दों की गुंजाइश हमेशा रही है। नेहरू अंततः बोले-“एक ऐसा मसौदा तैयार कीजिए जो ज़बान की ख़ूबसूरती भी बचाए और डॉ. हुसैन आसानी से पढ़ सकें।”दोनों ने मिलकर भाषा, राजनीति और संस्कृति के बीच एक ऐसा पुल बनाया,जो आज भी भारत की भाषाई विविधता का उदाहरण है।
नेहरू ने दिलवाई 8000 की स्कॉलरशिप
हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा “क्या भूलूँ, क्या याद करूँ” में यह दर्ज है- जब उन्हें विदेश अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति नहीं मिली,नेहरू ने अपने सचिव बी.एन. कौल को बुलाकर 8000 की स्कॉलरशिप दिलवाई। यह वही सहायता थी जिसने उनकी कैम्ब्रिज- PhD का रास्ता खोला। बच्चन सिर्फ़ कवि नहीं, उर्दू, हिन्दी, अंग्रेज़ी, अरबी और अवधी के उस्ताद थे। उनके लेखन में भारतीय भाषाओं की आत्मा एक-दूसरे में घुलती हुई दिखाई देती है।
बच्चन का जज़्बा-रोशनी का सफ़र
उनकी मशहूर कविता “मैं दीपक हूँ, मेरा जलना ही तो मेरा मुस्काना है…” यही उनकी ज़िंदगी का फलसफ़ा था। अंधेरों में रोशनी तलाशना, संघर्ष में सौंदर्य देखना। भाषा के सौंदर्य पर खड़ा एक ऐतिहासिक रिश्ता
