मुठिया आंदोलन के सिपाही, डॉ.मग़फूर अजाज़ी की अनसुनी दास्तान
आज मुल्क की आजादी को 79 साल हो चुके। मगर, हम अब भी जंग-ए- आजादी के नायकों की कुर्बानियों का डाटा एकत्र नहीं कर सके। उनको हमेशा मुल्क को याद करने की जरूरत है। मगर, चंद नायकों को छोड़ दें, तो तमाम नायकों को तारीख़ के सफ़्हों में पीछे धकेल दिया गया। ऐसा ही एक नाम है- डॉ. मग़फ़ूर अहमद अजाज़ी का, 3 मार्च 1900 को मुज़फ़्फ़रपुर (बिहार) के दीहुली गांव में एक ज़मींदार खानदान में जन्म लेने वाले डॉ.अजाज़ी के वालिद (पिता) मौलवी हफ़ीज़ुद्दीन हुसैन और दादा हाजी इमाम बख्श मज़हबी, सियासी और मिल्ली एहसास रखने वाले लोग थे। अजाज़ी साहब ने मदरसा-ए-इमदादिया दरभंगा और नॉर्थ ब्रुक ज़िला स्कूल से तालीम हासिल की।
रॉलेट एक्ट के खिलाफ़ आवाज़ उठाने पर निकाला स्कूल से
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1919 में रॉलेट एक्ट के खिलाफ़ आवाज़ उठाने पर उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया, लेकिन इसी से उनकी ज़िंदगी का रुख़ बदल गया, और वो असहयोग आंदोलन (1921) से जुड़ गए।
“मुठिया आंदोलन”- अनाज से निकली आज़ादी की ताक़त
मग़फूर अहमद अजाज़ी ने एक बेमिसाल तहरीक शुरू की। वह थी ‘मुठिया अभियान’। इस तहरीक में हर घर से हर खाने से पहले एक मुठ्ठी अनाज जमा किया जाता था, ताकि आज़ादी की जंग के लिए फंड और राशन इकट्ठा हो सके। यही अनाज, और चंदा कांग्रेस और खिलाफ़त कमेटी की रीढ़ बना। इसी से मुज़फ़्फ़रपुर कांग्रेस दफ़्तर (आज का तिलक मैदान) खरीदा गया।
विदेशी कपड़ों का जलाया अलाव
मग़फूर साहब का ताल्लुक अली ब्रादरान, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और मौलाना शौकत अली की तरह था। उन्होंने विदेशी कपड़ों का अलाव जलाकर खादी का प्रचार किया, और शराबबंदी की भी वकालत की।
पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव कराया पास
1921 में गिरफ्तारी, जेल और लाठीचार्ज झेला। 1941 में सविनय अवज्ञा आंदोलन में शरीक होकर फिर गिरफ़्तार हुए। 1942 में क्विट इंडिया आंदोलन में अहम किरदार निभाया। बॉम्बे कांग्रेस अधिवेशन (8 अगस्त 1942) में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पास कराने में मदद की। मगर, आज़ादी के बाद भी अजाज़ी साहब का काम नहीं रुका। उन्होंने क़ौमी और तहज़ीबी खिदमत जारी रखी। 1960 में उन्होंने मुज़फ़्फ़रपुर उर्दू कांफ्रेंस की सदारत की, और उर्दू को बिहार की दफ़्तरी ज़बान बनाने की मांग रखी। 26 सितंबर 1966 को मुज़फ़्फ़रपुर में उनका इंतकाल हुआ। उनका जनाज़ा शहर का सबसे बड़ा जुलूस था। जिसमें हर मज़हब और हर तबक़े के लोग शामिल हुए।
लाल किले की गैलरी में तस्वीर
उनकी आज भी लाल क़िला, दिल्ली में “आजादी के दीवाने” गैलरी में उनकी तस्वीर मौजूद है। मगर, अफ़सोस, किताबों और मीडिया ने उन्हें भूल सा दिया गया है।
