कलम से अंग्रेज़ों को ललकारा, और समाज में जागरूकता फैलाई
लेखक
मुहम्मद साजिद
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक नायकों ने अपने प्राणों की आहुति दी। इनमें से कुछ नाम इतिहास में तो दर्ज हैं, परंतु कई ऐसे महान नेता हैं, जिनकी कहानी समाज को प्रेरणा देती है, फिर भी उन्हें उतनी पहचान नहीं मिली। वक्कोम मजीद उन्हीं गुमनाम नायकों में से एक हैं, जिन्होंने अपनी राजनीति, सामाजिक सेवा और मानवतावादी विचारों से केरला और भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में गहरी छाप छोड़ी।
आधुनिक भारत के पक्षधर
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वक्कोम मजीद का जन्म 20 दिसंबर 1909 को त्रावणकोर राज्य के वक्कोम में एक प्रभावशाली मुस्लिम परिवार में हुआ। उनके पिता सैयद मुहम्मद और माँ मुहम्मद बीवी थीं। वे समाज सुधारक वक्कम अब्दुल खादर मौलवी के भतीजे थे, जिनसे प्रेरणा लेकर उन्होंने समाज में बदलाव लाने का रास्ता अपनाया। अपने परिवार की परंपरा और शिक्षा के साथ उन्होंने धार्मिक सहिष्णुता, आधुनिकता, शिक्षा और जातिविहीन समाज के आदर्शों को आत्मसात किया। वह हमेशा आधुनिक भारत के पक्षधर थे।
सियासत में प्रवेश और आज़ादी की लड़ाई
मजीद ने अपने छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। वे त्रावणकोर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। प्रदेश में कांग्रेस आंदोलन को आगे बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाई। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़ने के बाद उन्हें जेल भी जाना पड़ा। यही नहीं, जब स्वतंत्र त्रावणकोर की अवधारणा उठी, तो उन्होंने उसका विरोध किया और दो-राष्ट्र विचार के खिलाफ खड़े होकर जेल की सजा भुगती। उनके लिए राष्ट्र की एकता, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता सर्वोपरि थी।
समाज सुधारक और मानवतावादी नेता
वक्कोम मजीद केवल स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, वे सामाजिक सुधार के लिए भी सक्रिय रहे। उन्होंने इस्लाम में उदारवाद, आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक सोच का समर्थन करते हुए एक ऐसे समाज की कल्पना की जो जाति, धर्म और संकीर्णता से परे हो। उन्होंने समाज में आपसी भाईचारे, हिंदू-मुस्लिम एकता और मानवीय मूल्यों को बढ़ावा दिया।
त्रावणकोर-कोचीन राज्य विधानसभा के रहे सदस्य
मजीद त्रावणकोर-कोचीन राज्य विधानसभा के सदस्य रहे। उन्होंने शिक्षा, सामाजिक जागरूकता, आर्थिक समानता और न्याय को बढ़ावा देने के लिए कार्य किए। उनकी राजनीति किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं थी, बल्कि वह राष्ट्र निर्माण और मानवता के लिए समर्पित थी। वे हमेशा दबे-कुचले वर्गों, किसानों, मजदूरों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए आवाज उठाते रहे।
आधुनिक सोच का चिराग किया रोशन
10 जुलाई, 2000 को वक्कोम मजीद का निधन हो गया। उन्हें उनके पूर्वजों की कब्रिस्तान में वक्कोम ईस्ट मस्जिद के पास दफनाया गया। मगर, आज भी उनके विचार, उनकी राजनीति और उनका योगदान समाज के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उन्हें भारत के महान राष्ट्रवादियों में गिना जाता है, जिन्होंने न केवल अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, बल्कि समाज में समरसता, सहिष्णुता और आधुनिक सोच का दीप जलाया। ऐतिहासिक पुस्तकें जैसे “Freedom Struggle in Kerala”, “Indian National Congress Documents”, और “Social Reform Movements in South India” में वक्कोम मजीद के योगदान का उल्लेख मिलता है। हालाँकि, उन्हें उतनी व्यापक पहचान नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी, फिर भी उनके विचार आज भी प्रेरणा देते हैं।
