डॉ. सुनीलम
पूर्व विधायक
राष्ट्रीय अध्यक्ष, किसान संघर्ष समिति
भील आदिवासियों के बीच भगवान के रूप में पूजे जाने वाले समाजवादी चिंतक, स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक सुधारक मामा बालेश्वर दयाल का 28वां स्मृति दिवस 26 दिसंबर 2025 को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। इस अवसर पर राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात से हजारों आदिवासी अनुयायी चार दिन की पदयात्रा कर बामनिया स्थित मामा जी की समाधि पर पहुंचेंगे। 5 हजार से ज्यादा अनुयायी पदयात्रा पर, 50 हजार से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। 25 दिसंबर की रात से शुरू होने वाली इस पदयात्रा में 5,000 से अधिक अनुयायी शामिल होंगे, जबकि 50,000 से ज्यादा आदिवासी और भीलांचल के निवासी नारियल, अगरबत्ती, फूलमाला और मनौती का चढ़ावा लेकर समाधि स्थल पहुंचेंगे। कोरोना काल में भी श्रद्धालुओं की संख्या में कोई कमी नहीं आई थी, जो मामा जी के प्रति आदिवासी समाज की गहरी आस्था को दर्शाता है।
फसल पहले मामा को, फिर घर में, 250 से ज्यादा मंदिर
मामा बालेश्वर दयाल के प्रति श्रद्धा का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी आदिवासी समाज नई फसल का उपयोग मामा जी को चढ़ाने के बाद ही करता है।भील समाज ने अपने गांवों और घरों में 250 से अधिक मंदिर स्वयं बनवाए हैं, जहां नियमित पूजा-पाठ और भजन होते हैं। अंग्रेजों और रियासतों के खिलाफ अहिंसक संघर्ष के नायक इटावा (उत्तर प्रदेश) के निवाड़ी कला गांव में जन्मे बालेश्वर दयाल दीक्षित, खाचरोद, उज्जैन और भाभरा होते हुए बामनिया पहुंचे। उन्होंने भील आदिवासियों के साथ मिलकर अंग्रेजों और रियासतों की बेगार प्रथा के खिलाफ अहिंसक आंदोलन छेड़ा। 7 रियासतों से निर्वासन, तीन बार जेल, 1932 से 1937 तक बेगार विरोधी संघर्ष है। उस दौर में बेगार से इनकार करना गैरकानूनी माना जाता था। ईसाई धर्म अपनाने वालों को बेगार से छूट मिलती थी, जिससे बड़ी संख्या में आदिवासी धर्मांतरण को मजबूर हो रहे थे।
शिक्षा और सामाजिक सुधार को बनाया आंदोलन का आधार
मामा जी ने आदिवासी बच्चों की शिक्षा के लिए डूंगर विद्यापीठ की स्थापना की, जिसके तहत 13 पाठशालाएं, 2 आश्रम (बोर्डिंग) चलाए गए। डूंगर विद्यापीठ को हिंदू यूनिवर्सिटी प्रयागराज ने परीक्षा केंद्र के रूप में मान्यता दी। उन्होंने शराबबंदी, कर्ज मुक्ति और सामाजिक सुधार को जीवन मिशन बनाया।
गोलीकांड के खिलाफ आवाज, नेहरू तक पहुंची बात
1945 में बामनिया गोलीकांड और 1946 में रतलाम गोलीकांड के बाद मामा जी ने सीधे पंडित जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखे। नेहरू जी के हस्तक्षेप के बाद जांच हुई। दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की गई।पीड़ित आदिवासियों को मुआवजा मिला। 1942 में लगाए गए झूठे आरोपों के बाद मामा जी को निर्वासित किया गया, लेकिन आज़ादी के बाद 17 अगस्त 1947 को वे पुनः बामनिया लौटे।
जागीरदारी उन्मूलन में ऐतिहासिक भूमिका
मामा जी ने जागीरदारी प्रथा के खिलाफ नो टैक्स कैंपेन चलाया।आंदोलन के दबाव में तत्कालीन गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी को ऑर्डिनेंस जारी कर राजस्थान और मध्य भारत में जागीरदारी समाप्त करनी पड़ी। यह मामा बालेश्वर दयाल के संघर्ष की ऐतिहासिक जीत थी। लोहिया, जेपी से आत्मीय संबंध, समाजवाद की मिसाल जयप्रकाश नारायण तीन बार डॉ.राममनोहर लोहिया चार बार बामनिया आए। 1952 में मामा जी ने चार उम्मीदवार चुनाव में उतारे,जिनमें एक महिला थीं। बांसवाड़ा में महाराजा के खिलाफ यशोदा बहन को उतारकर ऐतिहासिक जीत दिलाई
नेहरू के प्रचार के बावजूद।
आदिवासियों के बीच भगवान कैसे बने मामा?
मामा जी ने कभी खुद को भगवान नहीं कहा,लेकिन निस्वार्थ सेवा, संघर्ष, त्याग और समानता के विचारों ने उन्हें आदिवासी समाज के लिए पूजनीय बना दिया। मृत्यु के बाद आदिवासियों ने उनकी मूर्तियां बनाकर मंदिरों में स्थापित कर दीं।आज उनके जीवन और विचारों पर 10 से अधिक शोध-प्रबंध (थीसिस) लिखे जा चुके हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष और समर्पण की विरासत, मामा बालेश्वर दयाल ने समाजवाद को जिया। आदिवासियों को आत्मसम्मान दिया। शिक्षा,संगठन और संघर्ष का रास्ता दिखाया उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और चेतना का स्रोत बना रहेगा।
