सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ हुए थे खड़े, लोकप्रियता से परेशान ताक़तों ने कर दी उनकी हत्या
लेखक
मुहम्मद साजिद
भारत की आज़ादी के संघर्ष में कई ऐसे नाम हैं, जिन्हें इतिहास की मुख्यधारा में जगह नहीं मिली। उनमें से एक नाम है “अल्लाह बक्श सूमरो” (1900- 1943),सिंध की मिट्टी में जन्मे इस जमींदार, समाजसेवी, राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी ने न केवल अंग्रेज़ों के खिलाफ संघर्ष किया, बल्कि धार्मिक आधार पर बंटवारे की राजनीति को खुलकर चुनौती दी। उनका जीवन सरल था, परंतु विचार गहरे। वे लोकतांत्रिक मूल्यों, भाईचारे और शिक्षा के पक्षधर थे।
सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ अडिग आवाज़
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सूमरो का मानना था कि भारत का भविष्य सांप्रदायिकता में नहीं, बल्कि हिंदू और मुसलमानों के साथ रहने में है। वे “United States of India” जैसे विचारों को बढ़ावा देते थे। उनका कहना था कि धर्म की राजनीति जनता के मन को विभाजित कर रही है। यही कारण था कि मुस्लिम लीग और जिन्ना जैसे नेताओं ने उनसे नफ़रत की। बावजूद इसके, खान अब्दुल गफ्फार खान और मौलाना आज़ाद जैसे नेताओं ने उनकी बात का समर्थन किया।
आज़ाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस में अंग्रेजों को चुनौती
23 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग ने लाहौर में अलग देश की माँग वाला प्रस्ताव पास किया। इसके जवाब में अल्लाह बक्श सूमरो ने दिल्ली में आजाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया। इसमें पूरे भारत से लगभग 75,000 लोग शामिल हुए। अंग्रेज़ी सरकार इससे भयभीत हुई और उन्हें दी गई खान बहादुर की पदवी छीन ली। उन्हें सिंध के प्रधानमंत्री पद से हटा दिया गया।
शिक्षा, सेवा और सादगी की मिसाल
सूमरो ने महात्मा गांधी के खादी आंदोलन का समर्थन किया। वे आम लोगों के लिए सेवा के कार्यों में सक्रिय रहे। ट्रेन में ऊपर की सीट लेकर दूसरों के लिए जगह छोड़ना और बाढ़ के समय नालियाँ बनवाकर गाँवों को बचाना उनकी मानवता का उदाहरण है।
उनकी हत्या, और रहस्य
14 मई 1943 को शिकारपुर जाते समय उनकी हत्या कर दी गई। उस समय यह चर्चा थी कि उनकी लोकप्रियता से भयभीत सांप्रदायिक ताकतों ने उनकी हत्या करवाई। यह हत्या आज भी रहस्य बनी हुई है। सात दशकों बाद भी उनकी स्मृति को राजनीति की मुख्यधारा में स्थान नहीं मिला।
उनका योगदान इतिहास में दर्ज
‘The Sindh Story’ (के.आर. मलकानी और पी.वी. ताहिलरमानी) और ‘Political Movements in North India’ जैसी पुस्तकों में उनके संघर्ष का उल्लेख मिलता है। वे उन नेताओं में थे जिन्होंने सांप्रदायिक राजनीति का विरोध करते हुए शिक्षा, सेवा और आज़ादी का मार्ग दिखाया।
