बरेली इस्लामिया गर्ल्स इंटर कॉलेज की पहली प्रिंसिपल, और बदायूं में जन्म
21 अगस्त, 1915 को बदायूं (उत्तर प्रदेश) के एक उच्च-मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी इस्मत आपा नौवें नंबर पर थीं। उनके छह भाई और चार बहनें थीं। पिता सरकारी अफ़सर थे। इसलिए घर का तबादला अक्सर होता रहा- जोधपुर, आगरा, अलीगढ़… यही वजह रही कि इस्मत का बचपन कई शहरों में बीता। भाइयों के साथ फुटबॉल, गिल्ली-डंडा खेलते हुए इस्मत का बिंदास और बाग़ी व्यक्तित्व बना। जिसकी झलक उनकी लेखनी में बार-बार नज़र आती है।
इस्लामिया गर्ल्स इंटर कॉलेज की पहली प्रिंसिपल
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इस्मत चुग़ताई सिर्फ़ बदायूं की बेटी नहीं थीं, बल्कि बरेली की इस्लामिया गर्ल्स इंटर कॉलेज की पहली प्रिंसिपल भी रहीं। उनके अनुशासन को हमेशा याद किया जाता है। उनकी आत्मकथा “काग़ज़ी है पैरहन” में “उल्टे बांस बरेली को” पढ़ते हुए कॉलेज के दिनों की झलक मिलती है। उन्होंने 1938 में इसाबेला थोबर्न कॉलेज, लखनऊ से B.A किया। इसके बाद में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से भी पढ़ाई की। वे बी.ए. और बी.टी करने वाली पहली मुस्लिम महिला थीं। बरेली के संजीव मेहरोत्रा बताते हैं कि उनकी लेखनी गजब की थी।
कलम का जादू और बेबाकी
इस्मत ने उर्दू में कहानियां, नॉवेल, नाटक और आत्मकथा सब लिखा। उनकी कहानियों में महिलाओं की इच्छाएं, उनका संघर्ष और समाज की सच्चाइयां बेबाकी से सामने आती हैं।
पहली कहानी ‘फसादी’ (1938) साक़ी पत्रिका में छपी। मज़ेदार बात ये कि लोग समझ बैठे कि ये उनके भाई मिर्ज़ा अजीम बेग ने छद्म नाम से लिखी है।
‘लिहाफ’ से अश्लीलता का केस
1942 में शादी से दो महीने पहले उन्होंने अपनी सबसे मशहूर और विवादित कहानी ‘लिहाफ’ लिखी। कहानी में एक ऐसी महिला थी। जिसे अपने पति से भावनात्मक-सामाजिक उपेक्षा मिलती है, और वह अपनी नौकरानी में सुकून तलाशती है। इस पर अश्लीलता का केस चला, लेकिन बाद में केस खारिज हो गया। लिहाफ ने उन्हें उर्दू अफसाना-निगारी की सबसे बोल्ड और बाग़ी लेखिका बना दिया।
मंटो और इस्मत की दोस्ती
मंटो और इस्मत के किस्से मशहूर हैं। मंटो ने लिखा “इस्मत की कलम और ज़ुबान दोनों तेज़ हैं। अगर इस्मत आदमी होती, तो मंटो होती और अगर मैं औरत होता तो इस्मत होता।”उन दोनों की सोच और लेखन की बेबाकी आज भी साहित्य जगत में मिसाल है।
फिल्मों में भी दिया योगदान
शाहिद लतीफ़ (पति) फिल्ममेकर थे, तो इस्मत ने भी फिल्मों में योगदान दिया। उनकी कहानी पर बनी फिल्म ‘गरम हवा’ को बेस्ट स्टोरी के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। उन्होंने श्याम बेनेगल की फिल्म ‘जुनून’ (1979) में एक छोटा रोल भी किया। उनका निधन 24 अक्टूबर 1991 को मुंबई में हुआ। उनकी प्रमुख कृतियां, और कहानी संग्रह – चोटें, छुई-मुई, एक बात, कलियां, एक रात, शैतान,उपन्यास: टेढ़ी लकीर, जिद्दी, दिल की दुनिया, मासूमा, जंगली कबूतर, अजीब आदमी, और आत्मकथा: काग़ज़ी है पैरहन
गूगल डूडल और लेगेसी
उनके 110 वें जन्मदिन पर Google Doodle ने उन्हें सम्मानित किया। आधुनिक उर्दू अफसानागोई के चार स्तंभों में उनका नाम मंटो, कृशन चंदर, राजिंदर सिंह बेदी के साथ लिया जाता है।
