डॉ. सुनीलम
राष्ट्रीय अध्यक्ष, किसान संघर्ष समिति
भारतीय समाजवादी आंदोलन के इतिहास में सुरेन्द्र मोहन का नाम उस वैचारिक योद्धा के रूप में दर्ज है, जिसने सत्ता, सुविधा और समझौते से दूर रहकर आजीवन जनसंघर्षों का पथ चुना। 15वीं पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उस राजनीतिक नैतिकता को याद करना है, जो आज के समय में दुर्लभ होती जा रही है।
आख़िरी बातचीत और अधूरा वादा
मेरी सुरेन्द्र मोहन जी से अंतिम बातचीत 16 दिसंबर 2010 की रात फोन पर हुई थी। उन्होंने छिंदवाड़ा में अडानी पावर प्रोजेक्ट और पेंच परियोजना के विरोध, मुलतापी में राष्ट्र सेवा दल की बैठक, और तेरहवें शहीद किसान स्मृति सम्मेलन में शामिल होने की सहमति दी थी। मुलतापी गोलीकांड मामले में उनसे गवाही देने का आग्रह किया गया, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। मजिस्ट्रेट के समक्ष तारीख भी तय हुई, लेकिन उससे पहले ही वे इस संसार से विदा हो गए।
मुलतापी आंदोलन के स्थायी साथी
12 जनवरी, 1998 के मुलतापी गोलीकांड के बाद सुरेन्द्र मोहन केवल समर्थन देने नहीं आए, बल्कि वे मुलतापीवासी बन गए। किसान संघर्ष समिति के हर नेता की खोज-खबर ली, आंदोलन की दिशा तय की और इसे राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। पूर्व प्रधानमंत्री इन्द्रकुमार गुजराल के प्रतिनिधि के रूप में वे मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से किसान नेताओं के साथ भोपाल में मिले। प्रशांत भूषण, पीयूसीएल और अन्य साथियों के साथ मिलकर इस मामले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तक पहुंचाया। जिसके चलते मुझे वर्षों तक सुरक्षा मिली।
संघर्षों में साथ, चुनावों में संबल
मैंने सात चुनाव लड़े,हर बार सुरेन्द्र मोहन प्रचार में मौजूद रहे। जब किसान महापंचायत ने मुझे लोकसभा उम्मीदवार घोषित किया, तब उन्होंने एच.डी. देवगौड़ा के माध्यम से आर्थिक सहायता दिलाई। राजनीति को उन्होंने कभी व्यक्तिगत लाभ का साधन नहीं बनाया, बल्कि आंदोलन को जीवित रखने का औजार बनाया।
जनआंदोलनों के राष्ट्रीय सेतु
शायद वे देश के इकलौते ऐसे नेता थे, जो राजनीतिक दलों में रहते हुए भी लगभग हर बड़े जनआंदोलन से जुड़े रहे। जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय की धुरी वही थे। अंबाला, चंडीगढ़, लखनऊ और दिल्ली में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, फिर सोशलिस्ट पार्टी, जनता पार्टी और जनता दल हर दौर में वे संगठनकर्ता और मार्गदर्शक रहे। जेपी आंदोलन के बाद जब अधिकांश समाजवादी नेता जेल में थे, तब उन्होंने अकेले कांग्रेस सरकार के खिलाफ मोर्चा संभाले रखा।
सत्ता से दूरी, सिद्धांतों से निकटता
जनता दल के विभाजन के बाद वे जनता दल (सेक्युलर) में रहे, लेकिन जब भाजपा के साथ सरकार बनी, तो उन्होंने स्पष्ट रुख अपनाते हुए बैठक बुलाकर देवगौड़ा को पार्टी से अलग कर दिया और नई राजनीतिक राह चुनी। वे सोशलिस्ट फ्रंट के संस्थापक बने और बाद में सोशलिस्ट पार्टी इंडिया का नेतृत्व किया। वे अक्सर कहते थे “1934 में जेपी और लोहिया के साथ युवा समाजवादी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बना सकते थे, तो आज नई पार्टी बनाने की हिम्मत क्यों नहीं?”
सादगी, सेवा और सहकार
सांसद और खादी ग्रामोद्योग आयोग के उपाध्यक्ष होने के बावजूद उनकी जीवनशैली में कोई दिखावा नहीं था। डीटीसी बस से आना-जाना, वीपी हाउस के एक कमरे में परिवार के साथ रहना और देशभर के समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने घर में ठहराना। यह उनकी पहचान थी। उन्होंने जीवनयापन परिवार पेंशन और लेखन से किया। असंख्य समाजवादी कार्यकर्ताओं के इलाज और आर्थिक सहायता में वे चुपचाप खड़े रहे।
मजदूर, किसान और सामाजिक न्याय के पक्षधर
वे हिंद मजदूर सभा के आजीवन मार्गदर्शक रहे और किसान-मजदूर एकता के प्रबल समर्थक। मंडल आंदोलन, रोजगार को मौलिक अधिकार बनाने की मुहिम, खादी ग्रामोद्योग के पुनर्जीवन, और कश्मीर से पूर्वोत्तर तक की समस्याओं पर उनकी गहरी पकड़ थी। नागा शांति वार्ता में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।
अंतरराष्ट्रीय समाजवादी संपर्क
वे सोशलिस्ट इंटरनेशनल,इंटरनेशनल यूनियन ऑफ सोशलिस्ट यूथ, नेपाली कांग्रेस, बर्मा में लोकतंत्र, तिब्बत की आज़ादी और भूटानी शरणार्थियों से जुड़े आंदोलनों में सक्रिय रहे। काठमांडू में नेपाल के राष्ट्रपति द्वारा उन्हें विशेष अतिथि के रूप में सम्मानित किया जाना उनके अंतरराष्ट्रीय कद को दर्शाता है।
‘जनता’ के संपादक, विचारों के प्रहरी
1946 से प्रकाशित समाजवादी साप्ताहिक पत्रिका ‘जनता’ के वे संपादक रहे। तमाम कठिनाइयों के बावजूद पत्रिका नियमित निकली। देशभर के समाजवादी उनके संपादकीय का इंतज़ार करते थे। अपने लेख वे स्वयं टाइप किया करते थे। यह उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
समाजवादी आंदोलन के दधीचि
मुलायम सिंह यादव, रामविलास पासवान, शरद यादव, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव सभी से उनका गहरा रिश्ता था। समाजवादी एकता की बात होती, तो सबकी निगाहें सुरेन्द्र मोहन पर टिक जाती थीं।
उन्हें यूं ही “समाजवादी आंदोलन का दधीचि” नहीं कहा गया। उन्होंने अपने जीवन की अस्थियाँ समाजवादी विचार को जीवित रखने के लिए समर्पित कर दीं।
