Malik Khizar Hayat Tiwana
तिवाना साहब की वजह से बचा पंजाब, बोले – मज़हब नहीं, तहज़ीब साथ
लेखक
मुहम्मद साजिद
मैं मुसलमान होते हुए भी अपने हिंदू और सिख रिश्तेदारों से अलग नहीं हो सकता… उनकी शादियों और दावतों में जाता हूँ, मैं उन्हें दूसरे मुल्क से कैसे आऊँ? यह बात कही थी सर मलिक खिज़र हयात तिवाना ने। उनको आज भी लोग याद करते हैं।
विभाजन के ख़िलाफ़ पंजाब की आवाज़
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https://youtu.be/oJtgnhTfthY?si=bjXx2SI4jYSaVouN
भारत के बंटवारे की कहानी अक्सर कांग्रेस और मुस्लिम लीग की सियासत तक सीमित कर दी जाती है। मगर, पंजाब यूनियनिस्ट पार्टी के नेता और पंजाब के प्रीमियर सर मलिक खिज़र हयात तिवाना (1900–1975) ने आख़िरी सांस तक Two-Nation Theory और पाकिस्तान के निर्माण का विरोध किया। उन्होंने कहा था- “Punjab is not just Muslims, it’s Hindus, Sikhs and Muslims together. हमारी तहज़ीब एक है, हमारी ज़मीन एक है। हमें कोई बाँट नहीं सकता।”
चुनाव, विरोध और इस्तीफ़ा
1946 के चुनावों में मुस्लिम लीग ने पंजाब की ज़्यादातर मुस्लिम सीटों पर जीत दर्ज की। मगर, तिवाना की Unionist Party ने कांग्रेस और अकाली दल के साथ मिलकर Coalition Government बनाई। मगर, जिन्ना और मुस्लिम लीग ने उन्हें “Muslim Traitor” और “Anti -Pakistan” कहकर निशाना बनाया, और Black Flags, Mock Funerals और Civil Disobedience ने पंजाब को अशांत कर दिया। आख़िरकार, 2 मार्च 1947 को उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। उनके इस्तीफ़े के सिर्फ़ 10 दिन बाद, Rawalpindi Massacre हुआ। इसमें हज़ारों सिख और हिंदू मारे गए। यह वही पंजाब था जो खिज़र के रहते शांत था।
कम्युनिज्म के सबसे बड़े विरोधी
तिवाना ने साफ़ कहा-“A Punjabi Muslim is closer to a Punjabi Hindu or Sikh, than to a Bengali Muslim.”उनकी यह सोच 1971 में बांग्लादेश के निर्माण के बाद और भी सच्ची साबित हुई। उन्होंने धर्म के नाम पर Communal Divide को नकारते हुए 1 March को Communal Harmony Day घोषित किया।
मुल्क के बंटवारे के बाद दिल्ली और शिमला में गुजारी जिंदगी
विभाजन के बाद तिवाना ने शिमला और दिल्ली में वक़्त गुज़ारा, फिर पाकिस्तान चले गए। मगर, वहाँ भी उन्हें “Traitor of Pakistan Movement” कहा गया और उनकी ज़मीनें तक़रीबन ज़ब्त कर ली गईं। आख़िरकार, वे अमेरिका चले गए और 19 जनवरी 1975 को California में उनकी मौत हुई। आज, सर खिज़र हयात तिवाना का नाम शायद इतिहास की किताबों में दबा दिया गया हो। मगर, वे उस आख़िरी दीवार थे। जिन्होंने बंटवारे की सियासी आँधी के आगे हिंदुस्तान की एकता की मशाल थामे रखी। भारत की आज़ादी की जंग सिर्फ़ Two Nation Theory और पाकिस्तान निर्माण तक सीमित नहीं थी। सर मलिक खिज़र हयात तिवाना जैसे नेताओं की सोच हमें याद दिलाती है कि यह ज़मीन सिर्फ़ मज़हबों की नहीं, बल्कि साझी तहज़ीब, मोहब्बत और इंसानियत की भी है।
