309 नगरीय निकायों के चुनाव परिणामों ने बदले राजनीतिक समीकरण, कई शहरों में बोर्ड गठन के लिए निर्दलीय पार्षद बने सबसे अहम
जयपुर: राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव के नतीजों ने शहरों की सियासत की तस्वीर बदल दी है। 309 नगरीय निकायों के चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिला, लेकिन कई शहरों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने दोनों प्रमुख दलों का गणित बिगाड़ दिया। खासकर नगर निगमों में किसी एक दल का दबदबा एक जैसा नहीं रहा। कहीं भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी तो कहीं कांग्रेस ने वापसी की। वहीं कुछ शहरों में निर्दलीय पार्षद इतने मजबूत होकर सामने आए कि अब बोर्ड गठन का फैसला उन्हीं के समर्थन पर निर्भर करेगा।
10 नगर निगमों में अलग-अलग तस्वीर
10 नगर निगमों के नतीजों में जयपुर, कोटा और अलवर में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है। उदयपुर और भीलवाड़ा में भी भाजपा बोर्ड बनाने की स्थिति में है। दूसरी ओर बीकानेर में कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है, जबकि अजमेर और पाली में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है। भरतपुर में निर्दलीय पार्षदों ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को पीछे छोड़ दिया। वहीं जोधपुर में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला लगभग बराबरी पर रहा। ऐसे में अलग-अलग शहरों के नतीजों ने राजस्थान की शहरी राजनीति में अलग तस्वीर पेश की है।
अजमेर में भाजपा को बड़ा झटका
अजमेर का नतीजा भाजपा के लिए सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। 80 वार्डों में कांग्रेस ने 37 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा 32 सीटों पर रह गई। निर्दलीयों ने 11 वार्डों में जीत दर्ज की। बहुमत के लिए 41 सीटों की जरूरत है, इसलिए कांग्रेस को भी बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीयों के समर्थन की आवश्यकता होगी। खास बात यह है कि पिछली बार अजमेर में भाजपा के 48 पार्षद जीते थे और पार्टी का बोर्ड बना था। इस बार कांग्रेस का सबसे बड़ा दल बनकर उभरना शहर की राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। यहां विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी और पूर्व मंत्री अनिता भदेल की राजनीतिक पकड़ की भी परीक्षा हुई है।
भरतपुर में निर्दलीयों ने दोनों दलों को पीछे छोड़ा
भरतपुर में चुनाव परिणाम ने सबसे अलग तस्वीर दिखाई। 65 वार्डों में निर्दलीय प्रत्याशियों ने 36 सीटें जीत लीं। भाजपा को 20 और कांग्रेस को महज सात सीटें मिलीं। बसपा और आरएलपी ने एक-एक वार्ड में जीत दर्ज की। यहां भाजपा और कांग्रेस की सीटें जोड़ने के बाद भी आंकड़ा निर्दलीयों से काफी पीछे है। ऐसे में बोर्ड गठन में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो गई है। 73 प्रतिशत से अधिक मतदान वाले भरतपुर में किसी एक बड़े राजनीतिक दल के पक्ष में स्पष्ट लहर नजर नहीं आई।
जयपुर में भाजपा सबसे आगे, पूर्व महापौर को हार
जयपुर के 150 वार्डों में भाजपा ने 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में बढ़त बनाई है। कांग्रेस ने 50 और निर्दलीयों ने 12 सीटें जीती हैं। बहुमत के लिए 76 सीटों की जरूरत है, यानी भाजपा बहुमत से केवल एक सीट दूर है। जयपुर में सबसे चर्चित नतीजों में पूर्व महापौर ज्योति खंडेलवाल की हार रही। कांग्रेस छोड़कर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाली खंडेलवाल वार्ड 110 में कांग्रेस की सुनीता मेठी से हार गईं। खास बात यह रही कि वह अपने किसी भी बूथ पर बढ़त नहीं बना सकीं। वहीं महापौर पद की दौड़ में माने जा रहे भाजपा के सुनील कोठारी ने 900 से अधिक वोटों से जीत दर्ज की। भाजपा ने मौजूदा महापौर कुसुम यादव का टिकट काटकर उन्हें मैदान में उतारा था। वार्ड 113 में कांग्रेस प्रत्याशी की 10,014 वोट की जीत भी चर्चा में रही।
जोधपुर में बराबरी की लड़ाई
जोधपुर में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला बेहद करीबी रहा। 99 वार्डों के घोषित नतीजों में दोनों दलों को 44-44 सीटें मिली हैं, जबकि अन्य के खाते में 11 सीटें गई हैं। एक वार्ड में इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन से जुड़ी तकनीकी दिक्कत के कारण परिणाम रुका हुआ है। कांग्रेस के शहर जिलाध्यक्ष ओमकार वर्मा की हार पार्टी के लिए बड़ा झटका रही। उन्हें भाजपा के पूर्व राज्यमंत्री मेघराज लोहिया ने हराया। वहीं भाजपा के पूर्व उपमहापौर देवेंद्र सालेचा भी चुनाव हार गए और कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष नरेशचंद्र जोशी ने जीत दर्ज की। ऐसे में जोधपुर में बोर्ड गठन का फैसला भाजपा और कांग्रेस से बाहर जीते पार्षदों के रुख पर निर्भर कर सकता है।
कोटा और अलवर में भाजपा की बढ़त
कोटा के 100 वार्डों में भाजपा ने 55, कांग्रेस ने 39 और निर्दलीयों ने चार सीटें जीती हैं। भाजपा यहां स्पष्ट बढ़त में है। हालांकि कुछ वार्डों में इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन से जुड़ी तकनीकी दिक्कत के कारण परिणाम अटके हुए हैं। अलवर के 65 वार्डों में भाजपा ने 28 और कांग्रेस ने 23 सीटें जीती हैं। अन्य के खाते में 13 और बसपा के खाते में एक सीट गई है। यहां भी भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है।
बीकानेर में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत
बीकानेर में कांग्रेस ने इस चुनाव में मजबूत प्रदर्शन किया है। पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद बोर्ड गठन को लेकर स्थिति साफ हो गई है। यह नतीजा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदेश की शहरी राजनीति में कांग्रेस को लंबे समय से कमजोर माना जाता रहा है।
सीकर में कांग्रेस की लगातार तीसरी जीत
सीकर नगर परिषद में कांग्रेस ने लगातार तीसरी बार बोर्ड बनाने का रास्ता साफ कर लिया है। 65 वार्डों में कांग्रेस के 38 प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की, जबकि भाजपा को 22 सीटें मिलीं। चार निर्दलीय और एक आरएलपी प्रत्याशी भी विजयी रहे। सीकर में बहुमत का आंकड़ा 33 है, इसलिए कांग्रेस को बोर्ड बनाने के लिए किसी बाहरी समर्थन की जरूरत नहीं है। पूर्व सभापति जीवण खां और उनकी पत्नी खतीजा ने भी अपने-अपने वार्ड से जीत दर्ज की।
पाली में कांग्रेस सबसे बड़ी, निर्दलीयों पर नजर
पाली नगर निगम में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन उसे अपने दम पर बोर्ड बनाने लायक बहुमत नहीं मिला है। ऐसे में यहां भी निर्दलीय पार्षद महत्वपूर्ण हो गए हैं। भाजपा के सामने चुनौती यह है कि सबसे बड़े दल के रूप में कांग्रेस को बोर्ड बनाने से रोकने के लिए उसे दूसरे दलों और निर्दलीय पार्षदों का समर्थन जुटाना होगा।
बाड़मेर में 15 साल बाद भाजपा को बहुमत
बाड़मेर नगर परिषद में भाजपा ने करीब 15 साल बाद बहुमत हासिल किया है। 55 वार्डों में भाजपा ने 29, कांग्रेस ने 21 और निर्दलीयों ने पांच सीटें जीतीं। नई बनी चौहटन नगरपालिका में भी भाजपा ने 20 में से 11 वार्ड जीतकर बोर्ड बनाने का रास्ता साफ कर लिया। यहां कांग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल सकी।
नतीजों का सबसे बड़ा संदेश क्या?
राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव परिणामों को एक साथ देखें तो सबसे बड़ा संदेश यही है कि शहरों में मुकाबला अब केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सीमित नहीं रहा। कई जगह स्थानीय मुद्दों, प्रत्याशियों की व्यक्तिगत पकड़ और बागी उम्मीदवारों ने चुनावी गणित बदल दिया। जयपुर, कोटा और अलवर में भाजपा की बढ़त जहां पार्टी के लिए राहत लेकर आई है, वहीं बीकानेर और सीकर में कांग्रेस का मजबूत प्रदर्शन उसके लिए उत्साह बढ़ाने वाला है। अजमेर, पाली और खासकर भरतपुर जैसे शहरों में निर्दलीयों की मजबूत मौजूदगी ने बोर्ड गठन को लेकर नए राजनीतिक समीकरण खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में इन शहरों में समर्थन और बोर्ड गठन को लेकर होने वाली राजनीतिक गतिविधियां खासा महत्वपूर्ण रहेंगी।
