गुमनाम नहीं-महान,मौलवियों के फ़तवे से लेकर संविधान सभा तक, बेगम क़ुदसिया ऐज़ाज़ रसूल की दास्तान
जब मौलवियों ने फ़तवा जारी किया, तब उन्होंने पर्दे को छोड़कर राजनीति का रास्ता चुना। जब मुस्लिम लीग टूटी, तब उन्होंने कांग्रेस का हाथ थामा। जब जमींदारी के विशेषाधिकार उनके सामने थे, तब उन्होंने जमींदारी उन्मूलन का समर्थन किया। यही थीं बेगम क़ुदसिया ऐज़ाज़ रसूल- भारतीय राजनीति की वो ख़ातून जिनकी मिसाल आज भी कम नहीं।”जब हम संविधान को याद करते हैं, तो संविधान सभा की उस अकेली मुस्लिम महिला को भुलाना नाइंसाफ़ी होगी, जिसने अपनी आवाज़ से धर्मनिरपेक्षता, महिला हक़ूक़ और अल्पसंख्यक राजनीति को नई पहचान दी।
ख़ान मलेरकोटला रियासत के नवाबी ख़ानदान में जन्म
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बेगम क़ुदसिया ऐज़ाज़ रसूल का जन्म 1909 में लाहौर (ब्रिटिश इंडिया) के नवाबी ख़ानदान में हुआ। उनके वालिद सर ज़ुल्फ़िकार अली ख़ान मलेरकोटला रियासत के शासक थे। शादी के बाद वो यूपी के संडीला (हरदोई) आईं और यहीं से उनका सियासी सफ़र शुरू हुआ।
यूपी विधानसभा की पहली मुस्लिम विधायक
1937 के चुनावों में उन्होंने एक गैर-आरक्षित सीट से जीत दर्ज कर यूपी विधान सभा की पहली मुस्लिम महिला विधायक बनने का इतिहास लिखा। 1946 में वो भारतीय संविधान सभा की सदस्य चुनी गईं, और वहाँ अकेली मुस्लिम महिला प्रतिनिधि रहीं। उन्होंने सरदार पटेल के प्रस्ताव का समर्थन कर अलग निर्वाचक मंडल और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण का विरोध किया।
नहीं डरी फतवों से भी
पर्दा छोड़कर जब वो सियासत में उतरीं, तो मौलवियों ने उनके खिलाफ फ़तवे जारी किए। लेकिन बेगम रसूल ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपने काम से समाज में महिला नेतृत्व की नई पहचान बनाई। वह 20 साल तक भारतीय महिला हॉकी महासंघ की अध्यक्ष रहीं। एशियाई महिला हॉकी महासंघ की भी चेयरपर्सन बनीं। 1952-54 में राज्यसभा सदस्य और 1969 से 1989 तक यूपी विधानसभा की सदस्य रहीं। 1969-71 तक उत्तर प्रदेश की समाज कल्याण और अल्पसंख्यक मंत्री भी रहीं। उनकी किताब “From Purdah to Parliament: A Muslim Woman in Indian Politics” आज भी एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। 2000 में उन्हें पद्म भूषण से नवाज़ा गया। 2001 में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी विरासत आज भी ज़िंदा है।
