भारत की पत्रकारिता के पहले शहीद, जिसने कलम को हथियार बनाकर आज़ादी की राह दिखाई
लेखक
मुहम्मद साजिद
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अनेक वीरों और शहीदों के नाम दर्ज हैं, लेकिन कुछ ऐसे नायक हैं जिनकी भूमिका इतिहास की मुख्य धारा में पर्याप्त स्थान नहीं पा सकी। शहीद मौलवी मोहम्मद बाकिर देहलवी उन्हीं में से एक हैं। वे न केवल एक पत्रकार थे, बल्कि राष्ट्रवादी चेतना का स्वर बनकर उभरे और अपने विचारों से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोगों को संगठित करने में अग्रणी भूमिका निभाई। उनके बलिदान ने उर्दू पत्रकारिता की शक्ति को देशभर में पहचान दिलाई, फिर भी अफसोस की बात है कि उन्हें वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।
उर्दू पत्रकारिता स्वतंत्रता संग्राम की ताकत
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भारत की आज़ादी के आंदोलन में उर्दू पत्रकारिता ने अद्वितीय योगदान दिया। लखनऊ से ‘हमदर्द’, दिल्ली से ‘रियासत’, पंजाब से ‘वंदे मातरम’ और ‘इंकलाब’, लाहौर से ‘मिलाप’ और ‘पयाम’ जैसे अखबारों ने न केवल खबरें छापीं बल्कि राष्ट्रवादी विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाया। उर्दू अखबारों ने सामाजिक एकता, सांप्रदायिक सद्भाव और राष्ट्रीय जागरूकता का संदेश दिया। ऐसे समय में जब अंग्रेजी शासन लोगों की आवाज़ दबाना चाहता था, तो उर्दू पत्रकारिता ने प्रतिरोध की मशाल थामी।
ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जनमानस को किया जागरूक
मौलवी मोहम्मद बाकिर देहलवी का नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना चाहिए। क्योंकि, उन्होंने उर्दू पत्रकारिता से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया था। वे दिल्ली में ‘दिल्ली उर्दू अखबार’ चलाते थे, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ जनमानस को जागृत करने वाले लेख प्रकाशित किए। उनके लेखों में क्रांतिकारियों का संदेश, आत्मसम्मान की भावना और अंग्रेजों के अत्याचारों का सच्चा चित्रण मिलता है।
स्वतंत्रता संग्राम में मुख्य भूमिका
1857 के विद्रोह में जब दिल्ली समेत भारत का बड़ा हिस्सा ब्रिटिश शासन के खिलाफ उठ खड़ा हुआ, तब मौलवी मोहम्मद बाकिर ने बिना भय के अपने अखबार में क्रांतिकारियों की आवाज़ प्रकाशित की। 17 मई 1857 के अंक में विद्रोही समाचारों का जोश और क्रांति का आह्वान था। यही उनकी ‘गलती’ बनी। अंग्रेज अधिकारियों ने उन्हें पकड़ लिया और बिना मुकदमे के तोप से उड़ा दिया। यही उनका अंतिम बलिदान था।
पत्रकारिता की पहली शहादत
इतिहासकार मासूम मुरादाबादी ने अपनी किताब में लिखा कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी जान देने वाला पहला पत्रकार उर्दू भाषा से आया। “इंकलाब ज़िंदाबाद” का नारा भी इसी पत्रकारिता की देन माना जाता है। यह नारा उन लाखों लोगों का स्वर बन गया, जो अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों से त्रस्त थे। मौलाना मोहम्मद हुसैन आज़ाद जैसे विद्वानों का नाम तो प्रसिद्ध है, लेकिन उनके पिता मौलवी मोहम्मद बाकिर का योगदान कम ही लोग जानते हैं। यह हमारे इतिहास की बड़ी चूक है कि एक महान स्वतंत्रता सेनानी पत्रकार को उतना स्थान नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था।
इतिहास में नहीं मिली जगह
आज जबकि स्वतंत्रता संग्राम पर अनेक किताबें लिखी जा रही हैं, इतिहास के उर्दू ग्रंथों में मौलवी बाकिर की शहादत का उल्लेख बहुत कम मिलता है। यह आवश्यक है कि उनकी कहानी को न केवल शोधकर्ताओं बल्कि आम जनता तक भी पहुँचाया जाए। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित किए जाएँ। आज भी उर्दू पत्रकारिता सामाजिक एकता, राष्ट्रीय अखंडता और सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभा रही है। ऐसे समय में जब समाज में विभाजन की ताकतें सक्रिय हैं, मौलवी मोहम्मद बाकिर जैसे क्रांतिकारियों की विरासत हमें रास्ता दिखाती है। उनकी कलम ने जिस राष्ट्रवाद को जन्म दिया था, उसे आज भी आगे बढ़ाना हमारी जिम्मेदारी है।
