आजादी का वो पठान, जिसने अहिंसा से हिला दिया ब्रिटिश राज, सीमांत गांधी ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान- भारत रत्न पाने वाले पहले विदेशी
लेखक
मुहम्मद साजिद
जब भी हम हिंदुस्तान की आज़ादी की जंग और अहिंसा की तालीम की बातें करते हैं, तो हमारी ज़ुबान पर महात्मा गांधी का नाम आता है। मगर, गांधी के ही दौर में एक और शख़्स थे, जिन्हें लोग ‘सीमांत गांधी’ कहते थे?। जी हाँ… हम बात कर रहे हैं ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान की। एक ऐसे पठान लीडर, जिनका क़द 6 फीट 4 इंच था, जो अपने तेवर से दुश्मन को हिला सकते थे… मगर दिल से अहिंसा के सच्चे पुजारी थे।
अंग्रेजों की गोली से 250 मासूमों की मौत
उनका जन्म 6 फ़रवरी 1890 को पेशावर के पास हुआ। बचपन से ही तालीम, सच्चाई और इंसाफ़ को उन्होंने अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बना लिया। 1929 में उन्होंने ख़ुदाई ख़िदमतगार (ईश्वर के बंदे) नाम से एक अहिंसक आंदोलन खड़ा किया। ये आंदोलन ब्रिटिश हुकूमत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया। 23 अप्रैल 1930 को पेशावर के किस्सा ख़्वानी बाज़ार में अंग्रेज़ों ने उनके समर्थकों पर गोलियाँ चला दीं। लगभग 250 मासूमों की जान गई, मगर, अहिंसा का रास्ता नहीं छोड़ा गया। गांधी और ग़फ़्फ़ार ख़ान की मुलाक़ात 1928 में हुई थी। इसके बाद दोनों की दोस्ती इतनी गहरी हुई कि लोग उन्हें गांधी का ‘सीमांत भाई’ कहने लगे।
बंटवारे का दर्द और ग़फ़्फ़ार ख़ान का विरोध
जब 1947 में मुल्क का बंटवारा हुआ, तो बादशाह ख़ान टूट गए। उन्होंने कहा था- “आपने हमें भेड़ियों के सामने फेंक दिया।”उनका सपना था कि पठानों के लिए अलग “पश्तूनिस्तान” बने, मगर ये मांग ठुकरा दी गई। पाकिस्तान जाने के बाद भी उन्हें चैन नहीं मिला। हुकूमत ने बार-बार जेल में डाला, नज़रबंद किया। कुल मिलाकर उन्होंने 27 साल जेल में गुज़ारे।
भारत रत्न पाने वाले पहले विदेशी
1987 में भारत सरकार ने उनकी कुर्बानियों और अहिंसा की सीख को सलाम कर उन्हें भारत रत्न से नवाज़ा। वे ये सम्मान पाने वाले पहले विदेशी थे। 20 जनवरी 1988 को उन्होंने आख़िरी सांस ली। उनकी वसीयत थी कि उन्हें अफ़ग़ानिस्तान के जलालाबाद में दफ़नाया जाए। आज भी उनकी मज़ार अहिंसा और इंसानियत का पैग़ाम देती है।
