14 बार जेल, पेंशन ठुकराने वाले उसूलों के सिपाही थे लतीफ़ शम्सी
मुल्क की जंग-ए-आजादी में लाखों भारतीयों ने कुर्बानियां दी हैं। इसके बाद ब्रिटिश हुकूमत से आजादी मिल पाई। इसी तरह से बिहार की जहानाबाद की सरज़मीं, ख़ासकर काको गाँव, हमेशा से तहज़ीब, मोहब्बत और क़ुर्बानी का गवाह रहा है। इसी मिट्टी ने हमें दिए सैयद लतीफ़ शम्सी उर्फ़ “अल्मा चचा”- एक नाम जो सिर्फ़ इंसान नहीं, बल्कि एक दौर की पहचान था। हालांकि, 21 मई, 1936 को जन्म लेने वाले अल्मा लतीफ़ शम्सी ने कुछ महीने पहले ही 8 जनवरी 2025 को इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कहा। उनका जाना सिर्फ़ एक शख़्स का जाना नहीं, बल्कि एक तहरीक का सुकूत (चुप्पी, मौन रहना) है।
शम्सी कोठी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का गढ़
देखें वीडियो 👇🏻
https://youtu.be/ayxl36eel0Y?si=bW0JhWcq4JBVNiHj
उनकी पैदाइश दिल्ली के वायसराय हाउस (आज का राष्ट्रपति भवन) में हुई। वालिद, लतीफ़ शम्सी, वायसराय के प्राइवेट सेक्रेटरी थे, जिन्होंने सुभाष चंद्र बोस के साथ ICS पास किया। लेकिन परिवार ने अंग्रेज़ों की नौकरशाही के साए में रहने के बजाय क़ौमी जंग-ए-आज़ादी का रास्ता चुना। काको की मशहूर शम्सी कोठी अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ मुजाहिदीन की बैठकों का गढ़ बनी। इसी कोठी में न सिर्फ़ गांधी जी और खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान आए, बल्कि 1971 का शिमला समझौता भी इसी कोठी में हुआ। उनकी कोठी से ब्रिटिश हुकूमत भी खौफजदा थी।
ब्रिटिश हुकूमत से बगावत में सबसे कम उम्र में गए जेल
वह आज़ादी की तहरीक के सिपाही थे। सबसे कम उम्र में ब्रिटिश हुकूमत से बगावत में जेल चले गए। उनको 14 दफ़ा (बार) अंग्रेज़ी हुकूमत ने कैद किया। वह हमेशा अदब और तहज़ीब के रखवाले रहे। उनकी किताबें “काको की कहानी अल्मा की ज़ुबानी” और “अलीगढ़ यूनिवर्सिटी और मेरी दास्तान-ए-हयात” आज भी अदब और इतिहास के ख़ज़ाने हैं। मगर, सियासत के बेबाक राजनेता ने लोहिया, कर्पूरी ठाकुर, जयप्रकाश नारायण और अटल बिहारी वाजपेई जैसे क़दावर नेताओं के साथ काम किया। मगर, कभी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया।
पेंशन को नहीं किया पसंद
उन्होंने कभी स्वतंत्रता सेनानी या मीसाबंदी की पेंशन स्वीकार नहीं की। वो कहते थे-“मैंने वतन के लिए कुर्बानी दी थी, कोई इनाम लेने के लिए नहीं।”कुछ वर्ष पहले बिहार के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान ने काको पहुँचकर उनकी क़ब्र पर फातिहा पढ़ी थीं, तो यह सिर्फ़ एक रस्म नहीं थी, बल्कि एक पैग़ाम था कि अल्मा शम्सी जैसे लोग इतिहास के हाशिये पर नहीं, बल्कि दिलों के सफ़हों पर लिखे जाते हैं। उनका जाना हमें यह याद दिलाता है कि असल “आजादी” सिर्फ़ सियासी नारा नहीं, बल्कि उसूलों पर जीने का नाम है।
