राजनीति पढ़े-लिखे लोगों का शगल नहीं, नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़ने की फिराक की बेबाक कहानी
लेखक
मुहम्मद साजिद
उर्दू अदब के अज़ीम शायर रघुपति सहाय ‘फिराक’ गोरखपुरी का नाम आते ही उनकी बेबाक शायरी और बाग़ी तबीयत याद आती है। आज यानी 28 अगस्त को फिराक गोरखपुरी की जयंती (यौम ए पैदाइश) है। बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने देश के पहले लोकसभा चुनाव यानी 1951 में सियासी किस्मत आजमाई थी। यह चुनाव अपने दोस्त प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना (स्वाधीनता सेनानी) के कहने पर लड़ा था। फिराक ने आचार्य कृपलानी की किसान मजदूर प्रजा पार्टी से गोरखपुर दक्षिण सीट से चुनाव लड़ा। उनकी मुख्य टक्कर महंत दिग्विजयनाथ (हिंदू महासभा) और सिंहासन सिंह (कांग्रेस) से थी। मगर, चुनाव के परिणाम चौंकाने वाले थे, फिराक को सिर्फ 9.16% (9586) वोट मिले, और उनकी जमानत जब्त हो गई। इसके बाद में उन्होंने कहा “राजनीति पढ़े-लिखे लोगों का शगल नहीं है।”नेहरू से गहरे पारिवारिक संबंधों के बावजूद उन्हें कांग्रेस के खिलाफ़ चुनाव लड़ना खटकता रहा। वे अपने मित्र पंडित जवाहरलाल नेहरू का सामना करने से झेंपते थे। इस अनुभव ने उन्हें राजनीति से हमेशा के लिए दूर कर दिया।
फिराक का चुनाव प्रचार अलमस्त और बेबाक
आकाशवाणी गोरखपुर में दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने अपने चुनाव प्रचार का दिलचस्प अंदाज़ बयान किया। एक बस को आधा दफ्तर, आधा प्रचार सामग्री का गोदाम बनाकर वे जहां तक बस जाती, वहीं तक प्रचार करते। उनके भाषण सिर्फ़ राजनीति तक सीमित नहीं रहते थे, बल्कि साहित्य, संस्कृति और सामाजिक मुद्दों पर भी होते।
जानें कैसे रघुपति सहाय से ‘फिराक’ बने
1927 में साप्ताहिक स्वदेश के होली अंक में उनकी ग़ज़ल छपी। संपादक रामनाथ लाल सुमन ने मज़ाक में उनके नाम के साथ “फिराक” जोड़ दिया। यह तख़ल्लुस उन्हें इतना भाया कि वे जीवन भर ‘फिराक गोरखपुरी’ के नाम से मशहूर हो गए। इससे पहले 1921 में गांधीजी की गिरफ्तारी के विरोध में लिखी उनकी ग़ज़ल “जो ज़बानें बंद थीं आज़ाद हो जाने को हैं”, उन्हें जेल तक ले गई। 1924 में वे नेहरू के बुलावे पर उनके निजी सचिव बने।
अदब का बेताज बादशाह
फिराक गोरखपुरी का अंदाज़ निराला था। मुशायरों में उनका बेबाक लहजा, चमकती आंखें, बीच-बीच में सिगरेट के कश और अदबी तर्क से सामने वाले को चुप करा देना। उनकी शायरी ने उर्दू में नया लहजा दिया। उनका मशहूर शेर आज भी उनकी याद दिलाता है “आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हमअसरों, जब उनको मालूम होगा तुमने फिराक को देखा है।”
यह हैं उनकी प्रमुख रचनाएँ
रघुपति सहाय ‘फिराक’ गोरखपुरी उर्दू अदब की दुनिया का वो नाम हैं। जिन्होंने शायरी को नया लहजा और नई रूह दी। उनकी ग़ज़लें, नज़्में और गद्य लेखन न सिर्फ़ साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि सामाजिक बदलाव का संदेश भी देते हैं। उनकी गजल गुल-ए-नग़मा, मशअल, धरती की करवट, रूप, ग़ज़लिस्तान, शोअला, साज़ आदि हैं। उन्हें 1968 में पद्मभूषण, गुल-ए-नग़मा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार मिला।
राजनीति में क्यों हुए असफल
फिराक राजनीति में हार गए, पर अदब में उनकी बादशाहत कायम रही। उनके शब्द आज भी गूंजते हैं क्योंकि वे सिर्फ़ शायर ही नहीं, बाग़ी सोच वाले इंसान थे। उन्होंने गोरखपुर का नाम विश्व पटल पर पहुँचाया। उनका जीवन यह बताता है कि साहित्य समाज का आईना है, राजनीति नहीं।
