जंग-ए-आज़ादी की पहली चिंगारी 1857 में भड़की… और इस आग को हवा देने वालों में हापुड़ के दो बहादुर नाम हमेशा याद रखे जाएंगे- चौधरी उल्फत खां, और उनके भाई जबरदस्त खाँ, ये वही चौधरी जबरदस्त खां हैं, जिनसे अंग्रेज भी घबराते थे। उनको ब्रिटिश हुकूमत ने गिरफ्तार किया। इसके बाद फांसी पर लटकाया गया। मगर, फांसी का फंदा एक बार नहीं, लगातार तीन बार टूटा, इसके बाद गोली मारकर जबरदस्त खां को शहीद किया।
भाई की गिरफ्तारी से खौला उल्फत चौधरी का खून
1857 की क्रांति का आगाज़ मेरठ में हुआ, जब अंग्रेज़ सरकार ने चौधरी जबरदस्त खाँ को कैद कर लिया, तो उनके भाई उल्फत खाँ का ख़ून खौल उठा। उन्होंने मेरठ से आगरा जाने वाली टेलीग्राफ लाइन काटकर अंग्रेज़ी हुकूमत की नींव हिला दीं। इतिहासकार एस.एन. सेन की किताब “1857: द रिवोल्ट” और क्षेत्रीय स्रोत बताते हैं कि टेलीग्राफ लाइन काटना उस दौर की सबसे बड़ी रणनीति थी, जिससे अंग्रेज़ों का आपसी संपर्क ठप हो जाता था।
चौधरी ब्रदर्स की गिरफ्तारी से हापुड़ में क्रांति
हापुड़ के इन दोनों चौधरी ब्रदर्स की गिरफ्तारी से हापुड़ में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ गुस्सा पनपने लगा। तमाम लोग सड़कों पर आ गए। सैकड़ों लोगों ने अंग्रेज़ों के खिलाफ बिगुल बजाया। मगर, अंग्रेज़ी हुकूमत ने क्रूरता की हद पार कर दी। हापुड़ में पीपल के पेड़ पर चौधरी उल्फत खां, और उनके भाई चौधरी जबरदस्त खाँ समेत उनके साथियों को फांसी पर लटका दिया।
एक महीने तक लगता है मेला
लेकिन उनकी कुर्बानी बेकार नहीं गई। 1975 से हर साल 10 मई को शुरू होकर एक महीने तक “शहीद मेला” आयोजित होता है। यह भारत में 1857 के शहीदों की याद में आयोजित होने वाला अनोखा और ऐतिहासिक मेला है। हापुड़ की मिट्टी आज भी जबरदस्त और उल्फत खाँ की शहादत की गवाही देती है। यह कहानी सिर्फ़ हापुड़ की नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के हर उस दिल की है जो आज़ादी से मोहब्बत करता है।
