117 वीं जयंती पर अमर शहीद शिवराम हरि राजगुरु की कहानी हर भारतीय को जाननी चाहिए
24 अगस्त 1908, महाराष्ट्र के रत्नागिरी ज़िले का एक छोटा सा गांव, यहीं जन्म हुआ शिवराम हरि राजगुरु का, जिन्हें इतिहास आज “राजगुरु” नाम से जानता है। सावन महीने के सोमवार को जन्म लेने के कारण उनका नाम भगवान शिव के नाम पर रखा गया। बचपन से ही उनमें अदम्य साहस और देशभक्ति का भाव था। उनके बड़े भाई चाहते थे कि वे अंग्रेजी भाषा सीखें, और सरकारी नौकरी करें, लेकिन राजगुरु का स्पष्ट उत्तर था, “मैं अंग्रेजी हुकूमत के लिए कभी काम नहीं करूंगा।” अंग्रेजी सीखने के मुद्दे पर हुए विवाद के बाद, 1924 में वे घर छोड़कर निकल आए।
चन्द्रशेखर से मुलाकात के बाद बदली जिंदगी
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नासिक में रहते हुए उनकी मुलाकात चंद्रशेखर आज़ाद, और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के क्रांतिकारियों से हुई। वहां से उनका जीवन पूरी तरह क्रांति की राह पर मुड़ गया। 1928 में, ब्रिटिश पुलिस अफसर जॉन सॉन्डर्स की हत्या में राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव का नाम प्रमुख रूप से सामने आया। यह घटना लाला लाजपत राय की मौत का बदला थी। सॉन्डर्स की हत्या के बाद राजगुरु पुणे लौट आए, लेकिन कुछ ही समय में ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
एक दिन पहले दे दी फांसी
लाहौर सेंट्रल जेल में उन पर मुकदमा चला। फांसी की तारीख तय हुई, 24 मार्च ,1931, लेकिन अंग्रेजों को डर था कि बढ़ते जनसमर्थन के कारण माहौल बिगड़ सकता है। इसलिए 23 मार्च, 1931 को शाम 7:33 बजे तीनों को फांसी दे दी गई।
जेल के पीछे गुपचुप तरीके से अंतिम संस्कार
उनका अंतिम संस्कार भी गुपचुप तरीके से जेल के पीछे कर दिया गया। उस समय उनकी उम्र मात्र 22 वर्ष थी। आज भी 23 मार्च को भारत और पाकिस्तान में लोग उनकी शहादत को याद करते हैं। लाहौर की वह जगह, जहां तीनों क्रांतिकारियों को फांसी दी गई, अब “शादमान चौक” कहलाती है, और मांग उठ रही है कि इसका नाम भगत सिंह के नाम पर रखा जाए। राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव, ये सिर्फ नाम नहीं, बल्कि आज़ादी की वो लौ हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी जलती रहेगी।
