31 अक्टूबर को जयंती पर विशेष: स्वतंत्रता संग्राम से किसान आंदोलनों तक अन्याय के खिलाफ उठाई आवाज, समाजवादी विचारधारा और नैतिक राजनीति के रहे प्रखर प्रवक्ता
विशेष लेख: भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और समाजवादी विचारधारा के इतिहास में आचार्य नरेंद्र देव का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि विचारक, शिक्षाविद, दार्शनिक और किसान आंदोलनों के प्रखर समर्थक थे। उनका पूरा जीवन अन्याय, शोषण और सामाजिक असमानता के विरोध में समर्पित रहा। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने उन्हें ‘अजातशत्रु’ कहा था। 31 अक्टूबर को उनकी जयंती पर उनके संघर्ष, विचारों और समाज निर्माण के संकल्प को याद करना प्रासंगिक है।
सीतापुर में जन्म, स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव
आचार्य नरेंद्र देव का जन्म 31 अक्टूबर 1889 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर में हुआ था। उनके घर का नाम अविनाशीलाल था। उनके पिता के मित्र पंडित माधव प्रसाद मिश्र ने उनका नाम नरेंद्र देव रखा। उनके पिता वकालत करते थे और बचपन से ही नरेंद्र देव उनके साथ कांग्रेस के कार्यक्रमों में जाने लगे थे। वर्ष 1905 में उन्होंने पहली बार बनारस कांग्रेस अधिवेशन में हिस्सा लिया। कांग्रेस में गरम दल के गठन के बाद वे उससे जुड़ गए। वर्ष 1915 में एलएलबी की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने फैजाबाद में वकालत शुरू की और होमरूल लीग की फैजाबाद शाखा के मंत्री चुने गए। काशी विद्यापीठ की स्थापना के बाद डॉ. भगवानदास के प्रस्ताव पर उन्हें इसका उपाध्यक्ष बनाया गया। वर्ष 1926 में वे विद्यापीठ के अध्यक्ष बने। शिक्षा और विचार निर्माण के क्षेत्र में उनका योगदान आगे चलकर समाजवादी आंदोलन की महत्वपूर्ण नींव बना।
पद और सत्ता से अधिक विचारों को दी प्राथमिकता
आचार्य नरेंद्र देव स्वभाव से बेहद संकोची थे। वे पद स्वीकार करने और चुनाव लड़ने से बचते थे। उन्होंने उत्तर प्रदेश प्रांतीय कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनने और जवाहरलाल नेहरू के प्रस्ताव पर कांग्रेस कार्यसमिति में शामिल होने से भी पहले इनकार कर दिया था। हालांकि, सहयोगियों के आग्रह पर बाद में दोनों जिम्मेदारियां स्वीकार कीं। वर्ष 1934 में जब जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन का प्रस्ताव उनके सामने रखा, तब उन्होंने सम्मेलन का सभापति बनने से मना कर दिया था। कार्यकर्ताओं के आग्रह पर वे बाद में सम्मेलन के सभापति बने। पार्टी का उद्देश्य पूर्ण स्वाधीनता रखना भी उनके विचारों का महत्वपूर्ण हिस्सा था। 9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर अहमदनगर ले जाया गया। 14 जून 1945 को जवाहरलाल नेहरू के साथ उनकी रिहाई हुई। आजादी के बाद जब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के कांग्रेस से अलग होने की स्थिति बनी, तो उन्होंने कांग्रेस छोड़ने का फैसला किया।
किसान आंदोलन को दी नई दिशा
आचार्य नरेंद्र देव को मार्क्सवादी और बौद्ध दर्शन का प्रखर विद्वान माना जाता है, लेकिन किसान आंदोलनों में उनकी भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही। वर्ष 1920 में असहयोग आंदोलन के दौरान अवध के रायबरेली, फैजाबाद, प्रतापगढ़ और सुल्तानपुर जिलों में किसान आंदोलन तेज हुआ। आचार्य नरेंद्र देव ने इस आंदोलन का खुलकर समर्थन किया। उनके प्रभावशाली भाषणों ने किसानों को संघर्ष जारी रखने का हौसला दिया। 7 जनवरी 1921 को मुंशीगंज में किसानों पर गोली चलाई गई, लेकिन दमन के बावजूद आंदोलन जारी रहा। किसानों ने गैरकानूनी कर न देने, बेगारी से इनकार करने और बेदखली के खिलाफ संघर्ष जारी रखने की प्रतिज्ञा की। इस आंदोलन के दबाव में सरकार को किसानों की बेदखली रोकने की मांग स्वीकार करनी पड़ी। वर्ष 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई। वर्ष 1939 में गया अधिवेशन में आचार्य नरेंद्र देव को अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने किसान संगठनों और कांग्रेस के बीच सहयोग पर जोर देते हुए कहा कि साम्राज्यवाद के खिलाफ दोनों को एक साथ खड़ा होना चाहिए। उनका सपना था कि किसान जमीन का मालिक बने, बिचौलियों के शोषण का अंत हो और किसानों को उनके श्रम का पूरा लाभ मिले। वर्ष 1949 में सोशलिस्ट पार्टी ने किसान पंचायत संघर्ष समिति बनाई। उत्तर प्रदेश का किसान पंचायत क्रांति सम्मेलन आचार्य नरेंद्र देव की अध्यक्षता में कानपुर जिले के सिठमरा गांव में हुआ। 25 नवंबर 1949 को लखनऊ में सोशलिस्ट पार्टी और किसान पंचायत के संयुक्त अधिवेशन में करीब 50 हजार किसानों ने भाग लिया। इस दौरान उन्होंने जमींदारी समाप्त करने, जमीन के बंटवारे, खेतिहर मजदूरों के कर्ज माफ करने और किसानों की बेदखली रोकने जैसी मांगें उठाईं।
अन्याय से समझौता नहीं करना ही थी उनकी नैतिकता
आचार्य नरेंद्र देव का मानना था कि मानव समाज के कल्याण और नैतिक जीवन के विकास के लिए अन्याय का विरोध जरूरी है। उनके अनुसार, नैतिक वही है जो अन्याय से समझौता न करे, खुद अन्याय न करे और दूसरों के साथ हो रहे अन्याय को भी सहन न करे। वे राजनीतिक स्वतंत्रता को ही पर्याप्त नहीं मानते थे। उनका सपना आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता के साथ एक ऐसे समाज का निर्माण करना था, जहां शोषण और असमानता के लिए कोई जगह न हो। वे समाजवादी समाज के साथ-साथ समाजवादी सभ्यता का निर्माण करना चाहते थे। इसके लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलाव के साथ जनता में जागरूकता और नैतिक मूल्यों का विकास आवश्यक मानते थे।
विद्वानों और नेताओं ने कुछ इस तरह किया याद
लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने आचार्य नरेंद्र देव को ‘अजातशत्रु’ बताते हुए उनके व्यक्तित्व, ज्ञान, इंसानियत और बौद्धिक क्षमता की प्रशंसा की थी। संपूर्णानंद ने उन्हें संस्कृत और पाली का उच्च कोटि का विद्वान बताते हुए काशी विद्यापीठ को गरिमा प्रदान करने वाला व्यक्तित्व कहा था। राहुल सांकृत्यायन ने उनकी अंग्रेजी भाषा पर असाधारण पकड़ और बौद्ध दर्शन के ज्ञान की सराहना की थी। उनकी पुस्तक ‘अभिधर्मकोश भाष्य’ को राहुल जी ने ऐतिहासिक ग्रंथ बताया था। कम्युनिस्ट घोषणापत्र के अनुवाद का काम भी दोनों ने मिलकर शुरू किया था, हालांकि यह पूरा नहीं हो सका। डॉ. राममनोहर लोहिया ने उन्हें बौद्ध दर्शन, साहित्य, इतिहास और राजनीति का गहरा जानकार बताया था। उनके अनुसार, आचार्य नरेंद्र देव के भाषण शिक्षाप्रद और जोश से भरे होते थे। उन्होंने काशी विद्यापीठ में हजारों विद्यार्थियों को समाजवादी विचारधारा से परिचित कराया। चंद्रशेखर ने उन्हें ऋषिकुल परंपरा का ऐसा संत बताया था, जिसने कठोर साधना के साथ जीवन बिताया और आमजन की पीड़ा को हमेशा प्राथमिकता दी। उन्होंने बुद्ध की करुणा और मार्क्स के दर्शन को अपने जीवन का आधार बनाया था।
19 फरवरी 1956 को हुआ निधन, विचार आज भी प्रासंगिक
आचार्य नरेंद्र देव लंबे समय से दमा की बीमारी से पीड़ित थे। महात्मा गांधी ने भी वर्धा आश्रम में उन्हें बुलाकर प्राकृतिक चिकित्सा कराई थी। बीमारी के बावजूद उनका सामाजिक और वैचारिक उत्साह जीवन के अंतिम समय तक बना रहा। 19 फरवरी 1956 को उन्होंने अंतिम सांस ली। आचार्य नरेंद्र देव का जीवन यह संदेश देता है कि समाज में वास्तविक बदलाव केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, नैतिकता और शोषण के खिलाफ संघर्ष से आता है। उनकी जयंती पर उन्हें याद करने का अर्थ किसानों, मजदूरों और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए आवाज उठाना और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के उनके विचारों को आगे बढ़ाना भी है।
