खुद स्कूल- कॉलेज खोले, और बोले – कौम तभी तरक़्क़ी करेगी, जब पढ़ेंगी बेटियाँ
लेखक
मुहम्मद साजिद
भारत की आज़ादी की जद्दोजहद और समाजी तहरीक़ात की किताबों में बड़े-बड़े नाम दर्ज़ हैं, लेकिन कई ऐसे शख़्स भी थे, जिन्होंने हमेशा ब्रिटिश हुकूमत का विरोध किया, और बिना शोर-शराबे के अपनी दौलत, इल्म और असर-ओ-रसूख़ को कौम की तरक़्क़ी के लिए वक़्फ़ कर दिया। उन्हीं में से एक नाम है बादशाह नवाब रिज़वी (1858–1920) पटना का वो गुमनाम सितारा जिसने तालीम, ख़ासकर लड़कियों की तालीम को अपनी ज़िंदगी का मक़सद बना लिया। हालांकि, आज हम “Education for All” की बात करते हैं, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पटना में एक सदी पहले ही बादशाह नवाब रिज़वी जैसे दूरदर्शी लोग इस राह पर चल चुके थे। वो सिर्फ़ “नवाब” नहीं थे, बल्कि कौम के रहबर, समाज सुधारक और तालीमी शमअ थे। ऐतिहासिक किताब “A Monumental History”, जिसमें पटना की तालीमी और समाजी तहरीक़ात में नवाब रिज़वी के योगदान का ज़िक्र है। इसके अलावा “Education and Reform in Colonial Bihar” में लड़कियों की तालीम के लिए उनके वक़्फ़ और जद्दोजहद पर चर्चा की गई है।
जमींदारी, और दौलत तालीम बेहतरी में की खर्च
बादशाह नवाब रिज़वी का असली नाम सैयद मुहम्मद मेहदी हसन था। आपका जन्म (पैदाइश) 30 जुलाई, 1858 यानी 18 ज़िल्हिज्जा 1274 हिजरी को पटना में हुई थी। आपके वालिद (पिता) नवाब सैयद शेख़ अली ख़ान, पटना के बड़े रईस और जागीरदार थे। बचपन से ही उन्हें इल्म और सामाजिक कामों की परवरिश मिली। पटना कॉलेज से तालीम मुकम्मल करने के बाद उन्होंने विरासत में मिली ज़मींदारी और दौलत को सामाजिक और तालीमी बेहतरी में लगाया।
अंग्रेज़ी हुकूमत और तालीम की जद्दोजहद
जहां उस दौर में कई रईस अंग्रेज़ों की चापलूसी कर अपनी हैसियत बचाने में लगे थे, तो वहीं बादशाह नवाब रिज़वी ने ब्रिटिश हुकूमत और उनकी तालीमी पॉलिसी का विरोध किया। उनका मानना था कि “असली आज़ादी सिर्फ़ तालीम से आएगी, और कौम तभी उठेगी जब बेटियां भी पढ़ेंगी।”
पटना हॉस्पिटल के लिए बड़ी रकम डोनेट की।
पटना मेडिकल कॉलेज में ग्रामीण वार्ड की नींव रखवाई। पटना नगरपालिका (Municipality) और कई अहम बोर्ड्स में रहकर गरीब और दबे-कुचले वर्ग के हक़ में आवाज़ उठाई। 1909 में उन्होंने अपनी ज़ायदाद का बड़ा हिस्सा वक़्फ़ कर दिया, और लड़कियों के लिए स्कूल और कॉलेज की नींव रखी। आज जिसे हम बी.पी. कॉलेज (बादशाह नवाब रिज़वी कॉलेज, पटना) के नाम से जानते हैं, वही उनकी दूरदर्शी सोच का नतीजा है। उस ज़माने में जब लड़कियों को पढ़ाना गुनाह समझा जाता था, उन्होंने बेबाकी से कहा- “कौम तभी तरक़्क़ी करेगी जब उसकी बेटियां पढ़ेंगी।”
शोहरत और नवाब का ख़िताब
1903 के दिल्ली दरबार में उनके काम का ज़िक्र हुआ। उनके शिक्षण संस्थान खोलने के बाद 1909 में अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें “नवाब” का ख़िताब दिया। 1911 के दिल्ली दरबार में भी शिरकत की, लेकिन उनकी असल पहचान एक रिफ़ॉर्मर, एजुकेशनिस्ट और इंसान-ए-कामिल की रही। बादशाह नवाब रिज़वी को फैन-ए-तामीर (architecture) का शौक़ था, और पटना के ग्रामीण इलाक़े में उनकी आलीशान हवेली “बादशाह नवाब मंज़िल” आज भी उनकी याद ताज़ा करती है। 1920 में उनका इंतिक़ाल हो गया, लेकिन उनकी छोड़ी हुई तालीमी और समाजी विरासत आज भी ज़िंदा है।
