लेखक
मुहम्मद साजिद
भारत के इतिहास में अनेक वीरांगनाओं ने अपने पराक्रम, नीति और न्यायप्रियता से अमर छाप छोड़ी है। परंतु इन सबमें एक नाम ऐसा है, जो राजसत्ता की मर्यादा से परे लोकमंगल का प्रतीक बन गया। मालवा की महारानी अहिल्याबाई होलकर, वो शासिका जिन्होंने न्याय के लिए अपने पुत्र को भी दंडित करने में संकोच नहीं किया, और जिन्होंने अपने शासन को धर्म, समानता और सेवा का पर्याय बना दिया।
पिता साधारण किसान, लेकिन रचा इतिहास
पुणे यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विजया जहांगीरदार किताब कर्मयोगिनी (Karmayogini: Life of Ahilyabai Holkar) के मुताबिक महारानी अहिल्याबाई होलकर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के चौंडी गाँव में हुआ था। उनके पिता मानकोजी शिंदे एक ग्राम-पटेल और साधारण किसान थे। अहिल्याबाई धनगर समुदाय से थीं। उस समय जब स्त्रियों को शिक्षा से वंचित रखा जाता था, पिता ने उन्हें पढ़ने-लिखने का अवसर दिया। यही शिक्षा आगे चलकर उन्हें भारत की सबसे विवेकशील प्रशासक बना गई।
सिर्फ आठ साल की उम्र में शादी
अहिल्याबाई होलकर की बायोग्राफी के मुताबिक आपकी शादी (विवाह) महज आठ वर्ष की थीं, तब मालवा के सूबेदार मल्हार राव होलकर ने उन्हें अपने पुत्र खांडेराव होलकर की पत्नी के रूप में चुना। खांडेराव युद्धप्रिय और कुछ असंयमी स्वभाव के थे, पर अहिल्या के संयम और बुद्धिमत्ता ने उन्हें शासन में रुचि लेना सिखाया। सन 1745 में अहिल्या ने पुत्र मालेराव को जन्म दिया और तीन वर्ष बाद पुत्री मुक्ताबाई का जन्म हुआ। लेकिन सन 1754 में भरतपुर के युद्ध में खांडेराव वीरगति को प्राप्त हुए। अहिल्या ने सती होने का निश्चय किया, पर उनके ससुर मल्हार राव ने उन्हें ऐसा करने से रोका। उन्होंने कहा “मैंने तुम्हें राज्य-धर्म सिखाया है, अब तुम्हें अपने लोगों के लिए जीना होगा।”
शासन की बागडोर और राजनीतिक दूरदर्शिता
सन 1766 में मल्हार राव के निधन के बाद, मालेराव को गद्दी मिली, परंतु कुछ ही वर्षों में उनकी भी मृत्यु हो गई। तब 1767 में अहिल्याबाई होलकर ने शासन संभाला और 1795 तक 28 वर्षों तक मालवा की रानी रहीं। उन्होंने महेश्वर को राजधानी बनाया और इंदौर को सैनिक एवं व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित किया। उन्होंने अपने प्रशासन को “धर्म और नीति” पर आधारित किया। हर जाति, धर्म और वर्ग के लिए समान न्याय,कर व्यवस्था में पारदर्शिता,किसानों को राहत और जल-सिंचाई परियोजनाओं का निर्माण,महिलाओं को शिक्षा और रक्षा में भागीदारी का अधिकार दिया।
न्यायप्रियता की मिसाल, अपने पुत्र को दी मृत्यु की सजा
लेखक जीके खरे की किताब के अनुसार महारानी अहिल्याबाई का सबसे प्रसिद्ध प्रसंग उनका न्याय का उदाहरण है। एक बार उनके पुत्र मालोजीराव के रथ से एक बछड़ा कुचलकर मर गया। अहिल्या को जब यह पता चला तो उन्होंने दरबार में कहा “जो किसी की मां के सामने उसके पुत्र की हत्या करे, उसे मृत्यु दंड मिलना चाहिए।”जब किसी ने बछड़े की मौत का कारण बताया, तो अहिल्या ने अपने ही पुत्र को उसी तरह सज़ा देने का आदेश दिया। रथ चलाने कोई तैयार नहीं हुआ, तब अहिल्या स्वयं सारथी बनीं। जैसे ही रथ आगे बढ़ा, वही गाय रथ के सामने आकर खड़ी हो गई और हटने से इंकार कर दिया। दरबारियों ने कहा “यह गाय भी दया की याचना कर रही है।”अहिल्या ने इसे भगवान का संकेत मानकर अपने पुत्र को क्षमा कर दिया, परंतु नियम यह तय हुआ कि राजा हो या रंक, कानून सबके लिए समान है।
धर्म, निर्माण और लोककल्याण के किए कार्य
अहिल्याबाई ने शासनकाल में 3800 से अधिक धार्मिक और सामाजिक निर्माण कार्य करवाए। काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी का जीर्णोद्धार, सोमनाथ मंदिर, गुजरात का पुनर्निर्माण, गया, उज्जैन, द्वारका, हरिद्वार आदि में घाट, सराय, जलाशय और धर्मशालाएँ बनवाईं, नर्मदा तट पर महेश्वर घाट और महेश्वर किला आज भी उनकी भव्य दृष्टि के प्रतीक हैं। अहिल्याबाई ने उस युग में शासन किया जब महिलाओं को राज्यकार्यों से दूर रखा जाता था।
उन्होंने महिला सेना बनाई, दरबार में महिलाओं की शिकायतें सुनीं और उनकी शिक्षा के लिए निधि बनाई।
उनका शासन “स्त्री नेतृत्व का आदर्श मॉडल” बन गया। एनी बेसेंट ने लिखा “अहिल्याबाई का शासन मालवा का स्वर्ण युग था। उनका न्याय, करुणा और कर्तव्यबोध उन्हें दिव्यता की ओर ले गया।”
लोकमाता क्यों कहलाईं
जनता उन्हें “लोकमाता” कहकर पुकारती थी, क्योंकि उन्होंने शासन को धर्म, सेवा और करुणा से जोड़ा।
उनके शासनकाल में मालवा प्रदेश में शांति, समृद्धि और सुरक्षा थी।इसीलिए ब्रिटिश यात्री Bishop Heber ने उन्हें लिखा “She was the most benevolent ruler India ever had.”
