दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) की उस याचिका को दूसरी पीठ के पास भेज दिया, जिसमें पार्टी ने मद्रास हाईकोर्ट के उन निर्देशों को चुनौती दी है जिनमें तमिलनाडु के सार्वजनिक स्थानों से राजनीतिक दलों के स्थायी झंडे के डंडे (फ्लैग पोल) हटाने का आदेश दिया गया था।
यह मामला जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ के समक्ष आया था। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि इसी तरह की एक याचिका पहले जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनी गई थी, इसलिए यह मामला उसी पीठ को भेजा जाना उचित होगा। अदालत ने निर्देश दिया कि मामले को जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए और आवश्यकता पड़ने पर मुख्य न्यायाधीश से भी उचित आदेश प्राप्त किए जाएं।
मद्रास हाईकोर्ट का आदेश क्या था?
मद्रास हाईकोर्ट ने अपने आदेश में तमाम राजनीतिक दलों, सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों को 12 सप्ताह के भीतर सार्वजनिक स्थलों से स्थायी फ्लैग पोल हटाने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट का कहना था कि सार्वजनिक स्थान जनता की संपत्ति हैं और उन्हें राजनीतिक या निजी उपयोग के लिए कब्जे में नहीं लिया जा सकता।
CPI-M की दलील: आदेश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन
सीपीआई (एम) ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि पार्टी जनता, खासकर मजदूर वर्ग से जुड़ी हुई है और झंडे जैसे प्रतीक उसके जनसंपर्क का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। पार्टी ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संगठन के अधिकार का उल्लंघन बताया।
पार्टी ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट का यह फैसला “न्यायपालिका द्वारा अनावश्यक कानून निर्माण” जैसा है। अब सुप्रीम कोर्ट की नई पीठ यह तय करेगी कि हाईकोर्ट का आदेश जारी रहेगा या उसमें संशोधन किया जाएगा।
दूसरा मामला: तेलंगाना हाईकोर्ट के जज बनाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट भड़का
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग याचिका पर तीखी टिप्पणी की, जिसमें एक व्यक्ति जीवी सरवन कुमार ने खुद को तेलंगाना हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त करने का निर्देश देने की मांग की थी। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की जगह अब मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की पीठ ने कहा कि ऐसी याचिका न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है और व्यवस्था का मजाक बनाती है।
मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने सख्त शब्दों में कहा आपने कहाँ सुना है कि कोई खुद को हाईकोर्ट का जज बनाने हेतु आवेदन दे सकता है? यह व्यवस्था का मजाक है। वकील ने बाद में खेद जताते हुए याचिका वापस लेने की मांग की, जिसके बाद अदालत ने याचिका को वापस लिया मानकर खारिज कर दिया। इस याचिका में प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, लोकसभा में विपक्ष के नेता, सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल समेत कई लोगों को पक्षकार बनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्तियां कॉलेजियम प्रणाली के तहत होती हैं, जिसमें मेरिट और प्रोफेशनल साख के आधार पर निर्णय लिए जाते हैं।
