गांधी-नेहरू-सुभाष के चहेते…मौलाना ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को बनाया हथियार,16 बीघा ज़मीन दान की आज़ादी के नाम
लेखक
मुहम्मद साजिद
भारत की आज़ादी की जंग सिर्फ़ तलवार और गोलियों से नहीं लड़ी गई… बल्कि ऐसे सिपाहियों ने भी लड़ी, जिन्होंने अपना सब कुछ क़ुर्बान कर दिया। उन्हीं में से एक नाम है-मौलाना मजहरुल हक़ का, 22 दिसंबर,1866 को पटना ज़िले में पैदा हुए मौलाना मजहरुल, एक ज़मींदार खानदान से ताल्लुक़ रखते थे। इंग्लैंड से वकालत की पढ़ाई कर लौटे, लेकिन आलीशान ज़िंदगी की बजाय वतन की गुलामी तोड़ने का रास्ता चुना। उनकी मुलाक़ात गांधी जी से इंग्लैंड में ही हुई थी, और यहीं से दोनों की दोस्ती ने उन्हें आज़ादी की राह में साथी बना दिया।
मौलाना की जमीन पर सदाकत आश्रम और विद्यापीठ कॉलेज
साल 1897… जब बिहार अकाल से कराह रहा था, लोग भूख से मर रहे थे। ऐसे मुश्किल वक़्त में मौलाना मजहरुल ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। राहत कार्यों से लेकर अनाज बाँटने तक, वो लोगों के हमदर्द बने। यही नहीं, 1920 में उन्होंने अपनी 16 बीघा ज़मीन दान कर दी, ताकि स्वतंत्रता आंदोलन को मज़बूत किया जा सके। इसी ज़मीन पर आगे चलकर सदाकत आश्रम (अब कांग्रेस का दफ्तर) और विद्यापीठ कॉलेज बने, जहाँ गांधी, राजेंद्र प्रसाद, सुभाष बोस और दूसरे क्रांतिकारी रणनीतियाँ तैयार किया करते थे।
महिलाओं के आजादी की लड़ाई में शामिल करने का उठाया बीड़ा
बिहार कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे, होमरूल आंदोलन में अहम किरदार निभाया, चंपारण सत्याग्रह में जेल गए और खिलाफ़त–असहयोग आंदोलनों में गांधी जी के कंधे से कंधा मिलाकर चले। औरतों को आज़ादी की लड़ाई में शामिल करने का भी उन्होंने खुलकर समर्थन किया। इसके लिए महिलाओं को जागरूक किया। यही वजह थी कि उन्हें ‘देश भूषण फ़कीर’ का ख़िताब मिला।
हिंदू-मुसलमान… एक ही नाव पर सवार, उठेंगे साथ, तो डूबेंगे भी साथ
मौलाना मजहरुल हक़ हमेशा कहते थे- “हम हिंदू हों या मुसलमान… हम एक ही नाव पर सवार हैं। उठेंगे तो साथ, डूबेंगे भी साथ।”उनका यह जज़्बा ही गंगा-जमुनी तहज़ीब की असली पहचान था। 20वीं सदी के इस महान क्रांतिकारी ने 1930 में दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी क़ुर्बानियाँ हमें हमेशा याद दिलाती हैं कि आज़ादी यूँ ही नहीं मिली… इसके लिए किसी ने ज़मीन दान की, किसी ने ज़िंदगी दान कर दी। आज बिहार में उनके नाम से यूनिवर्सिटी और संस्थान चल रहे हैं, लेकिन इतिहास की किताबों और हमारी ज़ुबान पर उनका नाम बहुत कम आता है। शायद अब वक़्त है कि हम मौलाना मजहरुल हक़ जैसे भूले-बिसरे नायकों को याद करें और सलाम करें।
