गोलियों से नहीं डरे टीपू और हैदर अली, अंग्रेज़ों को मिटाने की बनाई थी वैश्विक योजना
जब भी हम भारत की आज़ादी की लड़ाई की बात करते हैं, तो अक्सर 1857 के विद्रोह को ही ‘पहला स्वतंत्रता संग्राम’ कहा जाता है। लेकिन क्या सचमुच ये पहला मौका था जब किसी ने ‘आज़ाद भारत’ का सपना देखा? नहीं… असल में, 72 साल पहले ही, मैसूर के बहादुर शासक हैदर अली और उनके बेटे टीपू सुल्तान ने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ ऐसा मोर्चा खोला था, जिसने अंग्रेज़ों की नींव हिला दी।
हैदर अली की ‘ग्रैंड स्ट्रैटेजी’
देखें वीडियो 👇🏻 https://youtu.be/z3XugJejYMg?si=64KBCzpBq9bPycDw
ऐतिहासिक किताबों से हवाला मिलता है हैदरनामा (1784) से, जिसे नल्लप्पा- हैदर के ही एक अफसर ने लिखा था। उसमें ज़िक्र है कि हैदर अली ने साफ़ कहा था, “ब्रिटिश को सिर्फ़ भारत में हराना मुमकिन नहीं। उनका असली खेल यूरोप, कलकत्ता, बंबई और मद्रास तक फैला है। उन्हें हराने का एक ही रास्ता है – हर मोर्चे पर एक साथ हमला।” सोचिए दोस्तों… ये कोई मामूली सोच नहीं थी। हैदर चाहते थे कि फ्रांस, फारस और अफगानिस्तान को साथ लेकर अंग्रेज़ों पर धावा बोला जाए। ये प्लान सिर्फ़ ‘राज्य रक्षा’ का नहीं था, बल्कि एक ऑल-इंडिया स्ट्रगल का विज़न था।
टीपू सुल्तान यानी ‘ भारत का ‘टाइगर’
10 सितंबर 1780 को, कर्नल बेली की सेना को टीपू ने घेर कर ऐसी शिकस्त दी कि ब्रिटिश लेखक F.E. Penny (1914) ने लिखा”यह भारत में ब्रिटिश हथियारों के साथ हुई सबसे बुरी हारों में से एक थी।” एक और हवाला Maistre de La Tour का है, जो हैदर के फ्रेंच अफसर थे। उन्होंने लिखा यह युवा राजकुमार (टीपू) ही था जिसने कर्नल बेली और फ्लेचर को हराकर युद्ध का फ़ैसला बदल दिया। सिकंदर की तरह, उसने अठारह साल की उम्र में जीतना शुरू किया था।
भूख से तड़पने लगे थे अंग्रेज़ सैनिक
मैंगलोर (1784) की घेराबंदी में अंग्रेज़ सैनिक इतने भूखे हो गए कि उन्हें मेंढक और कौवे खाने पड़े। मजबूर होकर उन्होंने शांति की भीख माँगी और टीपू सुल्तान ने शर्तों पर समझौता करवाया। इतिहासकार मानते हैं कि 1857 ने ‘राष्ट्रव्यापी विद्रोह’ को परिभाषित किया, लेकिन अगर हम ध्यान से देखें तो हैदर अली और टीपू सुल्तान ने उससे भी पहले ‘यूनाइटेड इंडिया’ का खाका खींचा था। उनकी लड़ाई सिर्फ़ मैसूर के लिए नहीं थी… बल्कि उस अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ थी जो पूरे भारत पर क़ब्ज़ा जमाना चाहती थी। आज ज़रूरत है कि भारत के पहले सैन्य रणनीतिकारों और स्वतंत्रता सेनानियों के रूप में हैदर और टीपू को उस मुक़ाम पर रखा जाए, जिसके वो हक़दार हैं।
