भारत के सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी खुदीराम बोस की जुझारू कहानी
लेखक
मुहम्मद साजिद
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो कम उम्र में भी अपने अदम्य साहस और बलिदान के कारण अमर हो गए। खुदीराम बोस उनमें से सबसे कम उम्र के क्रांतिकारी थे। जिन्होंने मात्र 18 वर्ष की अल्पायु में ब्रिटिश हुकूमत के कठोर औजारों को चुनौती दी, और फांसी की सजा पाकर भी अमरत्व प्राप्त किया। खुदीराम का जन्म 3 दिसंबर, 1889 को बंगाल के मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में हुआ था। बचपन में ही माता-पिता को खो देने के बाद उनकी बड़ी बहन ने अपने त्याग और स्नेह से उनका पालन-पोषण किया। शिक्षा के दौरान ही वह राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हुए, और नौवीं कक्षा के बाद पूरी तरह क्रांतिकारी जीवन के लिए समर्पित हो गए।
ब्रिटिश मजिस्ट्रेट पर किया बम से हमला
1905 में बंगाल के विभाजन के विरोध में उठे जन-आन्दोलन ने खुदीराम को रिवोल्यूशनरी पार्टी से जोड़ा। वे वंदे मातरम् के पर्चे बांटने, ब्रिटिश दमन के खिलाफ युवाओं को संगठित करने में अग्रणी रहे। 1908 में उन्होंने और उनके साथी प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर के ब्रिटिश मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफोर्ड पर बम हमला किया। हालांकि, किंग्सफोर्ड बच गए। मगर, परंतु उनकी पत्नी और बेटी की मृत्यु हो गई। इसी घटना के आरोप में खुदीराम को गिरफ्तार कर फांसी की सजा सुनाई गई।
युवाओं में खुदीराम बोस की धोती का क्रेज
अपनी फांसी की सजा पर खुदीराम बोस ने जज को कहा था, “आपको भी बम बनाना सिखा दूं,” जो उनकी बेबाकी, निडरता और देशभक्ति की मिसाल है। 11 अगस्त 1908 को मात्र 18 वर्ष की उम्र में उन्हें फांसी दे दी गई। उनकी शहादत ने पूरे भारत को झकझोर दिया, और युवाओं में क्रांतिकारी विचारों को नई ऊर्जा प्रदान की। खास बात यह है कि उनके नाम वाली धोती का चलन बंगाल के युवाओं में बड़ा लोकप्रिय हुआ, जो उनके साहस और देशभक्ति का प्रतीक बन गई।
उम्र का मोहताज नहीं सच्चा साहस
खुदीराम बोस का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा साहस उम्र का मोहताज नहीं होता, और देश के प्रति समर्पण हर उम्र की शक्ति बन सकता है। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे नायक थे जिनकी कहानी न केवल इतिहास की किताबों में, बल्कि युवा पीढ़ी के दिलों में भी सदैव जिंदा रहेगी।
