धर्म बनाम जाति : क्या सभी हिंदुओं को है कथा कहने का हक़ ? इटावा केस से छिड़ी नई बहस
इटावा/लखनऊ: यूपी के इटावा ज़िले में दो कथावाचकों मुकुट मणि यादव और संत सिंह यादव ने आरोप लगाया है कि उन्हें उनके एक जाति विशेष यजमान ने कथावाचन करने पर जातिगत आधार पर अपमानित किया और उनके साथ मारपीट की गई। इस घटना के बाद धार्मिक जगत में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या सभी हिंदू जातियों को भागवत कथा कहने का अधिकार है या यह केवल ब्राह्मणों तक सीमित है?। हालांकि, इसको लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है कि काशी विद्वत परिषद ने “कथा कहने का अधिकार हर हिंदू को बताया है।”इसी तरह से शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने “अपनी जाति के लोगों को कोई भी कथा सुना सकता है, लेकिन सभी जातियों को कथा सुनाने का अधिकार केवल ब्राह्मणों को है।” यह दोनों बयान सोशल मीडिया में काफी तेजी से वायरल किए जा रहे हैं।
देश के 10 प्रमुख कथावाचकों की जाति
देश के प्रमुख कथावाचकों की जाति भी सोशल मीडिया पर वायरल की जा रही हैं। इसमें अनिरुद्धाचार्य (अनिरुद्ध राम तिवारी) जाति ब्राह्मण जबलपुर, म.प्र., देवकीनंदन ठाकुर जाति ब्राह्मण मथुरा, उ.प्र.,धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (बागेश्वर धाम) जाति ब्राह्मण छतरपुर, म.प्र., प्रदीप मिश्रा जाति ब्राह्मण सीहोर, म.प्र., संत रामपाल जी जाति जाट सोनीपत, हरियाणा, भोले बाबा / सूरजपाल जाति दलित एटा, उ.प्र., बाबा रामदेव (रामकिशन यादव) जाति यादव महेन्द्रगढ़, हरियाणा, मोरारी बापू जाति अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) भावनगर, गुजरात, जया किशोरी जाति ब्राह्मण सुजानगढ़, राजस्थान देवी चित्रलेखा ब्राह्मण पलवल, हरियाणा बताई जा रही है। हालांकि, विश्वसनीय सूत्रों की मानें, तो यह सही हैं। मगर, “The Justice Hindi” किसी भी कथावाचक की जाति की पुष्टि नहीं करता।
समाज में गूंज रही आवाज
इस दौराज समर्थन में “धर्म आत्मा का विषय है, न कि जाति का। कथा कहने का अधिकार जन्म से नहीं, कर्म से तय होना चाहिए।” यह बात वायरल की जा रही है, तो वहीं विरोध में “परंपरा और वेदों के अनुसार कुछ अनुष्ठान और कार्य केवल ब्राह्मण ही कर सकते हैं।”
जानें क्या कहता है संविधान?
भारतीय संविधान में धर्म और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है। इसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी धार्मिक विषय पर अपने विचार रख सकता है, चाहे उसकी जाति कोई भी हो।
