संभल हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा- कबूलनामा अकेले एहतियाती हिरासत का आधार नहीं हो सकता
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी एनएसए के तहत एहतियाती हिरासत को रद्द कर दिया। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि किसी आरोपी का कबूलनामा अकेले राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत एहतियाती हिरासत का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने हिरासत आदेश को अवैध तरीके से शक्ति का इस्तेमाल मानते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की लागत भी लगाई।
कबूलनामे को अकेला आधार नहीं बनाया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एहतियाती हिरासत का आदेश पारित करते समय हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी को मामले से जुड़ी अन्य परिस्थितियों पर भी स्वतंत्र रूप से विचार करना जरूरी है।मुल्ला अफरोज के मामले में अदालत ने पाया कि संबंधित प्राधिकारी ने सभी प्रासंगिक परिस्थितियों पर उचित तरीके से विचार नहीं किया और एहतियाती हिरासत की शक्ति का गलत इस्तेमाल किया। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत आदेश को रद्द कर दिया।
अक्टूबर 2025 में लगाया गया था एनएसए
मुल्ला अफरोज पर अक्टूबर 2025 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की थी। उन पर नवंबर 2024 में संभल में हुई हिंसा में कथित भूमिका का आरोप था। मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहले उनकी एहतियाती हिरासत को बरकरार रखा था। इसके बाद मुल्ला अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने अब हाईकोर्ट के उस फैसले को भी निरस्त कर दिया है।
यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये की लागत
सुप्रीम कोर्ट ने एहतियाती हिरासत के आदेश को अवैध बताते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की लागत लगाई है। अदालत के फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि एहतियाती हिरासत जैसी असाधारण शक्ति का इस्तेमाल कानूनी प्रक्रिया और प्रासंगिक तथ्यों पर उचित विचार के साथ होना चाहिए।
क्या है राष्ट्रीय सुरक्षा कानून?
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत केंद्र और राज्य सरकारें कुछ परिस्थितियों में ऐसे व्यक्ति को एहतियातन हिरासत में रखने का आदेश दे सकती हैं, जिसके संबंध में सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े निर्धारित कानूनी आधार मौजूद हों। यह सामान्य आपराधिक गिरफ्तारी से अलग व्यवस्था है। इसमें व्यक्ति को किसी संभावित गतिविधि को रोकने के उद्देश्य से हिरासत में रखा जाता है। कानून में हिरासत की समीक्षा के लिए सलाहकार बोर्ड की व्यवस्था भी है।
नवंबर 2024 में संभल में भड़की थी हिंसा
संभल में नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद के सर्वे को लेकर तनाव बढ़ा था। अदालत के आदेश पर मस्जिद के सर्वे के दौरान 24 नवंबर को विरोध कर रहे लोगों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़प हुई थी। इस हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे। इसके बाद पुलिस ने मामले की जांच करते हुए कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई की थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से एहतियाती हिरासत पर अहम टिप्पणी
मुल्ला अफरोज के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि एहतियाती हिरासत का आदेश केवल किसी एक कबूलनामे या सामग्री के आधार पर नहीं दिया जा सकता। हिरासत प्राधिकारी को उपलब्ध अन्य प्रासंगिक तथ्यों और परिस्थितियों पर भी उचित विचार करना होगा।
