फर्जी सैन्य कर्मी को तीन साल की सजा,घर में घुसकर की गई थी बुजुर्ग की हत्या, एडीजे कोर्ट ने सभी आरोपियों को सुनाई आजीवन कारावास की सजा
बरेली : करीब 12 वर्ष पुराने चर्चित हत्याकांड में बरेली की एडीजे कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अपर सत्र न्यायाधीश (न्यायालय संख्या-1) विजेंद्र त्रिपाठी की अदालत ने दीपावली की शाम घर में घुसकर एक बुजुर्ग की हत्या करने के मामले में छह आरोपियों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने सभी दोषियों पर विभिन्न धाराओं के तहत जुर्माना भी लगाया है। कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह सफल रहा है। इस मामले में डीजीसी रीतराम राजपूत ने मजबूत पैरवी की थी।

दीपावली की खुशियां मातम में बदली थीं
यह मामला भमौरा थाना क्षेत्र के मकरंदपुर धाराजीत गांव का है।अभियोजन के अनुसार 23 अक्टूबर 2014 को दीपावली के दिन शाम करीब सात बजे अनिल कुमार अपने परिवार के साथ घर पर दीप जला रहे थे। इसी दौरान गांव के वेद प्रकाश उर्फ छोटा, राम प्रकाश, जयराम, भगवानदास, वीरेन्द्र और तत्कालीन प्रधान सत्यपाल हथियारों से लैस होकर उनके घर पहुंच गए। आरोप है कि सभी आरोपी घर में घुसे और अनिल कुमार के पिता शिव सिंह को बाहर खींचकर लोहे की रॉड और लाठी-डंडों से बेरहमी से पीटा। मौके पर मौजूद कुछ आरोपियों के पास तमंचा और लाइसेंसी रायफल भी थी, जिसके कारण परिवार और ग्रामीण हस्तक्षेप नहीं कर सके। गंभीर रूप से घायल शिव सिंह की उपचार के दौरान मौत हो गई थी।
साक्ष्यों के आधार पर दोष सिद्ध
घटना के बाद भमौरा पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की और आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने गवाहों और साक्ष्यों के माध्यम से आरोप साबित किए। अदालत ने माना कि सभी आरोपियों ने साझा उद्देश्य के तहत वारदात को अंजाम दिया था और उनके खिलाफ प्रस्तुत साक्ष्य पर्याप्त हैं।
इन धाराओं में सुनाई गई सजा
अदालत ने सभी छह दोषियों को धारा 302/149 आईपीसी के तहत आजीवन कारावास और 10-10 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई। इसके अलावा दंगा, घर में घुसकर हमला करने, गाली -गलौज और धमकी देने से संबंधित धाराओं में भी अलग-अलग अवधि की कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई गई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी सजाएं एक साथ चलेंगी और जेल में बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित किया जाएगा।
मृत्युदंड नहीं, उम्रकैद को माना उचित
सजा पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दोषियों की आर्थिक स्थिति का हवाला देकर नरमी की मांग की थी, जबकि अभियोजन पक्ष ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए कठोर दंड की मांग की। अदालत ने कहा कि यह मामला ‘विरल से विरलतम’ श्रेणी का नहीं है,इसलिए मृत्युदंड के बजाय आजीवन कारावास न्यायोचित होगा।
फर्जी सेना कर्मी को भी तीन साल की सजा
इसी बीच बरेली की अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट शुभम की अदालत ने असम निवासी अखिल कलिता को भारतीय सेना का सदस्य बताने और सेना की वर्दी पहनकर लोगों को भ्रमित करने के मामले में दोषी ठहराया। अदालत ने उसे तीन वर्ष के साधारण कारावास और एक हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई है। करीब 12 साल तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद आए इस फैसले को पीड़ित परिवार के लिए न्याय की दिशा में बड़ी सफलता माना जा रहा है। इसके साथ ही यह फैसला संदेश देता है कि गंभीर अपराधों में कानून के शिकंजे से बच पाना संभव नहीं है, चाहे फैसला आने में कितना भी समय क्यों न लगे।
