लेखक
डॉ सुनीलम
पूर्व विधायक
अध्यक्ष, किसान संघर्ष समिति
देश में सामाजिक न्याय की राजनीति की पहचान बने पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की पुण्यतिथि पर उनके संघर्षों, योगदान और उनके साथ हुए अन्याय को याद करते हुए किसान नेता डॉ. सुनीलम ने भावुक टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है जैसा नारा भारत की राजनीति में केवल वी.पी. सिंह के लिए ही गूंजा और यह उनकी ईमानदारी का सबसे बड़ा प्रमाण है।
बोफोर्स विवाद में ‘सुपर क्लीन’ छवि
जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को ‘मिस्टर क्लीन’ कहा जाता था, तब जनता ने बोफोर्स घोटाले के बीच वी.पी. सिंह को “सुपर क्लीन” नेता मानकर उन पर भरोसा जताया। उनकी ईमानदारी उनके हर फैसले में दिखी और यही कारण था कि वे जनता के बीच एक बेदाग नेता की पहचान बनाकर उभरे।
मंडल कमीशन लागू कर बदला देश का सामाजिक संतुलन
सवर्ण परिवार में जन्म लेने के बावजूद वी.पी. सिंह ने डॉ. लोहिया के नारे पिछड़ा पावे सौ में साठ को साकार किया और मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू कर पिछड़े वर्ग को 27% आरक्षण देने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फैसले को संविधान सम्मत माना। मंडल विरोधियों के हमलों-पत्थर, लाठी और जानलेवा हमलों-के बावजूद वे अपने रुख से नहीं डिगे और सामाजिक न्याय की लड़ाई में अडिग रहे।
रथ यात्रा और सत्ता छोड़ने का साहस
भाजपा की रथ यात्रा का उन्होंने खुलकर विरोध किया। इसके चलते उनकी सरकार केवल 343 दिन में गिरा दी गई, लेकिन उन्होंने किसी भी प्रकार का राजनीतिक समझौता करने से साफ इंकार कर दिया।बाबरी मस्जिद विध्वंस का भी उन्होंने खुले तौर पर विरोध किया। दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने का मौका आया, तब भी उन्होंने पद ठुकरा दिया और देवेगौड़ा को समर्थन देकर लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूती दी।
सक्रिय राजनीति से संन्यास के बाद भी जुड़े रहे आंदोलन से
राजनीति से दूर रहने के बावजूद वी.पी. सिंह लगातार सामाजिक आंदोलनों की मजबूत आवाज बने रहे। उन्होंने दिल्ली में झुग्गियों को तोड़े जाने के खिलाफ बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया, दादरी किसान आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते हुए अनिल अंबानी का प्रोजेक्ट रद्द कराया और डंकल ड्राफ्ट तथा एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर का खुलकर विरोध किया। डॉ. सुनीलम के अनुसार, भले ही उन्हें नई आर्थिक नीति का समर्थक माना जाता था, लेकिन वे किसानों और गरीबों के हितों के खिलाफ किसी भी नीति को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।
डॉ. सुनीलम और वी.पी. सिंह का विशेष संबंध
राजनीति से संन्यास लेने के बाद डॉ. सुनीलम और वी.पी. सिंह के बीच नजदीकियां और गहरी हो गईं। डॉ. सुनीलम बताते हैं कि मायलोमा जैसी जानलेवा बीमारी से जूझते हुए भी वी.पी. सिंह युवा शक्ति अभियान से जुड़े रहे, डायलिसिस के बावजूद स्ट्रेचर पर जाकर वी.पी. हाउस में आयोजित सम्मेलन में पहुंचे, दिल्ली की झुग्गी बस्तियों को बचाने के लिए बस्ती में स्वयं जाकर आंदोलन का समर्थन किया और मुलताई किसान आंदोलन तथा भोपाल किसान संघर्षों में भी पूरी एकजुटता दिखाई। राजनीति से दूरी के उन वर्षों में कविता और पेंटिंग उनकी आत्मा की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति बन गई थीं।
सामाजिक न्याय का योद्धा खुद अन्याय का शिकार हुआ
डॉ. सुनीलम ने अफसोस जताया कि जिस सामाजिक न्याय की विचारधारा के लिए वी.पी. सिंह ने अपना पूरा जीवन दे दिया, वही ताकतें उनकी विरासत को संभालने में असफल रहीं।उनके अनुसार- सामाजिक न्याय के संगठनों, पार्टियों और समर्थकों ने वी.पी. सिंह के साथ न्याय नहीं किया। वे स्वयं सामाजिक न्याय के योद्धा थे, पर अंत में वे अन्याय के शिकार हो गए।
भारतीय राजनीति पर अमर छाप
27 नवंबर 2008 को उनका निधन हुआ, लेकिन भारतीय राजनीति में उनकी ईमानदारी, सादगी और सिद्धांतों पर टिके रहने की मिसाल आज भी वैसी ही चमकती है। आज भी उन्हें सामाजिक न्याय के सबसे बड़े सेनानी और राजनीति में नैतिकता की अंतिम आवाज के रूप में याद किया जाता है।
