आजाद हिंद फौज के पहले बड़े दानी, जिनका नाम किताबों में भी नहीं मिलता
आज़ादी की लड़ाई में कई नाम रौशनी में आए… और कई वक़्त की धूल में दब गए। इसी में एक नाम है अब्दुल हबीब यूसुफ़ मारफ़ानी मेमन का। मगर, यह नाम आज के हिंदुस्तान में शायद ही किसी किताब के पहले पन्ने पर मिलता हो, लेकिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज के लिए उनका त्याग बे-मिसाल है।
दिल में हिंदुस्तान के लिए बेतहाशा मोहब्बत
गुजरात के धोराजी शहर के मुस्लिम कारोबारी अब्दुल हबीब यूसुफ़ मारफ़ानी, सिर्फ़ तिजारत के लिए मशहूर नहीं थे, बल्कि अपने दिल में हिंदुस्तान के लिए बेतहाशा मोहब्बत रखते थे। सन 1944, रंगून में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फ़ौज को मज़बूत करने के लिए आज़ाद हिंद बैंक की स्थापना की। हबीब मारफ़ानी वो पहले शख़्स थे। जिन्होंने बैंक के लिए आर्थिक योगदान दिया। एक करोड़ रुपये नक़द, और अपनी बीवी के गहने। उस वक़्त के एक करोड़ रुपये, आज के अरबों रुपये के बराबर थे, जब हबीब ने सोने-चांदी से भरी थाल और नक़दी नेताजी के सामने रखी, तो नेताजी भावुक हो उठे।
नेताजी ने की तारीफ, जानें क्या बोले…
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने काफी तारीफ की थी। उन्होंने कहा था कि “भाइयों, आज मैं बहुत खुश हूं… कि लोग देश के लिए अपना सब कुछ त्यागने को तैयार हैं। हबीब जो किया है, वो क़ाबिले-तारीफ़ है।”
नेताजी ने सेवक-ए-हिंद”के खिताब से नवाजा
उनके इस त्याग के लिए नेताजी ने उन्हें “सेवक-ए-हिंद” के ख़िताब से नवाज़ा। इतिहास की कुछ किताबों, और म्यांमार (बर्मा) में बसे पुराने व्यापारिक परिवारों की यादों में उनका नाम आज भी है, लेकिन स्कूल की किताबों और सरकारी यादगारों में वो गुमनाम हो चुके हैं। आज, उनका परिवार म्यांमार में रहता है। उनके पोते याक़ूब मेमन को भारत सरकार ने दिल्ली में सम्मानित किया, लेकिन अब्दुल हबीब का त्याग आज भी आम जनता के लिए एक अनजानी कहानी है।
मुल्क की आजादी में सबका योगदान
अब्दुल हबीब यूसुफ़ मारफ़ानी का नाम इस बात का सबूत है कि हिंदुस्तान की आज़ादी सिर्फ़ एक मज़हब, एक तबके या एक इलाक़े की देन नहीं, बल्कि हर उस इंसान की थी। जिसने मुल्क की मिट्टी को अपनी जान और माल से ऊपर रखा।
