जब जिन्ना और मौलाना आज़ाद आमने-सामने आए,हिंदू-मुस्लिम एकता का सबसे बड़े थे पैरोकार
भारत की आज़ादी की लड़ाई के सबसे बड़े सिपहसालारों में से एक नाम मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का है, वो सिर्फ़ आज़ादी के योद्धा नहीं थे, बल्कि भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब के असली पहरेदार भी थे। मौलाना का जन्म 11 नवंबर, 1888 को मक्का (सऊदी अरब) में हुआ। पिता खैरुद्दीन 1857 की क्रांति के बाद वहीं चले गए थे। कुछ साल बाद परिवार वापस आया, और कलकत्ता (अब कोलकाता) में बस गया। मगर, कम उम्र में ही माँ-बाप का साया उठ गया। औपचारिक शिक्षा न मिल पाई, लेकिन घर पर ही अरबी, फ़ारसी, उर्दू और इल्मी किताबों से वो आगे बढ़े।
18 जनवरी 1920 को गांधी से पहली मुलाक़ात
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मौलाना की 18 जनवरी, 1920 को पहली बार मुलाक़ात हुई महात्मा गांधी से। यही से आज़ाद की राजनीतिक राह तय हुई। 1923 में वो कांग्रेस के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष बने। 1940 में फिर से कांग्रेस अध्यक्ष बने, और यहीं से शुरू हुई जिन्ना से उनकी टकराहट।
जिन्ना का ख़त और 36 का आंकड़ा
मौलाना की किताब Maulana Azad – A Life के मुताबिक जिन्ना और मौलाना आज़ाद की खटास इतनी गहरी थी कि जिन्ना ने एक चिट्ठी में लिखा “आप भारतीय मुसलमानों का भरोसा खो चुके हैं। कांग्रेस ने आपको दिखावटी तौर पर अध्यक्ष बनाया है। अगर, आपके अंदर ज़रा सा भी स्वाभिमान है तो इस्तीफ़ा दे दीजिए। इसके जवाब में मौलाना ने लिखा हिंदू और मुसलमान आपस में लड़ सकते हैं, लेकिन दोनों सगे भाई हैं। भाइयों की लड़ाई होती रहती है। मतभेद को बढ़ाने से हल नहीं निकलेगा।
बंटवारे के सख़्त ख़िलाफ़
राजमोहन गांधी की किताब Eight Lives “A Study of the Hindu-Muslim Encounter” में लिखा है कि जब लॉर्ड माउंटबेटन ने देश के विभाजन का प्लान रखा, मौलाना सबसे पहले विरोध में खड़े हुए। उन्होंने कहा “किसी भी क़ीमत पर हिंदुस्तान के दो टुकड़े नहीं होने दूँगा।”लेकिन हालात ऐसे बने कि पटेल और नेहरू भी बंटवारे के लिए तैयार हो गए। यही वो वक़्त था, जब मौलाना को सबसे ज़्यादा तकलीफ़ पहुँची।
पहले शिक्षा मंत्री, और हिंदुस्तान का विज़न
15 अगस्त, 1947 के बाद मौलाना को मिला शिक्षा मंत्रालय। उन्होंने IITs, UGC और कई शैक्षिक संस्थानों की नींव रखी। उन्हें सही मायनों में Architect of Modern Indian Education कहा जाता है।
आख़िरी वक़्त में जवाहर लाल से बोले, ख़ुदा हाफ़िज़
1958 में लगातार गिरने की वजह से उनकी सेहत बिगड़ गई। 19 फ़रवरी को बाथरूम में गिरे, कमर की हड्डी टूट गई। उस वक्त पीएम नेहरू मिलने आए, तो आख़िरी बार कहा जवाहर, ख़ुदा हाफ़िज़। 22 फ़रवरी 1958 को उन्होंने हमेशा के लिए दुनिया से रुख़्सत ली। मौलाना ने हिंदुस्तान की असली ताक़त, हिंदू-मुस्लिम एकता को बताया था। उन्होंने मतभेद को नफ़रत में न बदलने की बात कही थी। मौलाना आज़ाद सिर्फ़ एक लीडर नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की रूह थे।
