1904 में जब ग़ुलाम हिन्दुस्तान ब्रिटिश राज की जंजीरों में कैद था, उसी वक़्त अल्लामा मोहम्मद इक़बाल ने लिखा- “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा”। यह तराना न सिर्फ़ उस दौर के ग़ुलाम हिन्दोस्तानियों के दिलों को हिम्मत देता था बल्कि अंग्रेज़ हुकूमत के लिए एक सीधा चैलेंज भी था। इतिहासकार रज़ा अली आबिदी और तारिक़ रमज़ान के मुताबिक़, Iqbal’s “Tarana-e-Hind” became the cultural anthem of resistance की किताब में कहा गया है कि अंग्रेज भी उनकी लेखनी से परेशान थे। उनका 9 नवंबर 1877, सियालकोट (अब पाकिस्तान) में हुआ था, असली नाम मोहम्मद इक़बाल मसऊदी था।यह परिवार मूल रूप से कश्मीरी ब्राह्मण था, जिन्होंने 17वीं सदी में इस्लाम अपनाया। लाहौर केगवर्नमेंट कॉलेज, और कैंब्रिज का ट्रिनिटी कॉलेज, म्यूनिख यूनिवर्सिटी से (PhD) की।
हिंदू -मुस्लिम एकता का पैगाम
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इक़बाल दोनों तहज़ीबों (हिंदू और मुस्लिम) के संगम पर खड़े नज़र आते हैं। उनकी शायरी में कभी सूफ़ी रंग है, कभी राष्ट्रवाद और कभी इस्लामी रूहानियत है। लंदन में पढ़ाई के दौरान इक़बाल का दिल अतिया फ़ैज़ी पर आया। वह एक मॉडर्न और आज़ाद ख़याल मुस्लिम औरत थीं। यही वक़्त था जब उनकी शायरी में इश्क़, मोहब्बत और पश्चिमी सभ्यता की आलोचना झलकने लगी। यूरोप का भौतिकतावाद उन्हें खलने लगा और वहीं से उन्होंने “ख़ुदी” का फ़लसफ़ा गढ़ा।
पाकिस्तान का सवाल, और इक़बाल
अक्सर इक़बाल पर आरोप लगते हैं कि उन्होंने पाकिस्तान का ख्व़ाब दिखाया। लेकिन कुछ इतिहास की किताबों में असली “Pakistan Demand” चौधरी रहमत अली ने 1933 में रखी थी। इक़बाल ने सिर्फ़ मुस्लिम लीग के प्लेटफ़ॉर्म से अलग पहचान की बात की थी। मगर, जिन्ना और मुस्लिम लीग ने इसे पूरी तरह राजनीतिक हथियार बना लिया।
पश्चिम की अंधी नकल को बताया ग़लत
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है। उनका यह शेर काफी प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने पश्चिम की अंधी नकल को ग़लत बताया, और पूर्वी रूहानियत को ताक़त, अरब साम्राज्यवाद और शिया-सुन्नी तफ़रक़े की आलोचना की। मुल्क की आजादी से पहले 21 अप्रैल 1938 को लाहौर में इक़बाल का इंतकाल हुआ। भारत आज़ाद हुआ, पाकिस्तान बना, लेकिन इक़बाल की गजल दोनों मुल्कों में ज़िंदा रही। आज भी उनका तराना “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा” हिन्दुस्तान की रूह में बसता है।
