दलित–वंचितों की पहली टीचर, सावित्री बाई के मिशन की मज़बूत सहारा
हम अक्सर इतिहास की किताबों में बड़े नेताओं और मर्दों के योगदान को सुनते–पढ़ते आए हैं, लेकिन वह औरतें, जिन्होंने समाज को बदलने में अपनी ज़िंदगी खपा दी, अक्सर गुमनामी में खो जाती हैं। ऐसी ही एक शख़्सियत हैं फ़ातिमा शेख़, जिनका नाम भारत की पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका और सावित्री बाई फुले की सबसे क़रीबी साथी के तौर पर दर्ज है। हालांकि, फ़ातिमा शेख़ का ज़िक्र हमें मुख्यतः सावित्री बाई फुले के ज़रिये मिलता है। उन्हें भारत की पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका माना जाता है। उन्होंने सावित्री बाई के साथ मिलकर दलितों, पिछड़ों और औरतों के लिए स्कूल खोले। समाज का विरोध, ताने, पत्थर और गोबर फेंके जाने जैसी यातनाएँ उन्हें भी झेलनी पड़ीं।
फातिमा के भाई ने दी पनाह
देखें वीडियो 👇🏻
https://youtu.be/0R7hxc0jzdA?si=PMVXHC_LRk9qNTvt
इतिहासकारों के मुताबिक, जब फुले दंपति को उनके पिता ने घर से निकाल दिया, तो उन्हें उस्मान शेख़ (संभवतः फ़ातिमा के भाई) ने अपने घर जगह दी। उसी घर से पहला स्कूल शुरू हुआ था।
फातिमा शेख आंदोलन की रीढ़
पुणे में 1848 में खुले पहले लड़कियों के स्कूल में सावित्री बाई और फ़ातिमा शेख़ ने मिलकर पढ़ाना शुरू किया। वंचितों और औरतों की तालीम को लेकर उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा। सावित्री बाई की एक चिट्ठी (10 अक्टूबर 1856) में साफ़ लिखा है “मेरी फ़िक्र न करें, फ़ातिमा को तकलीफ़ होती होगी। मगर, वह आपको परेशान नहीं करेगी, और किसी तरह की शिकायत नहीं करेगी।”यह साबित करता है कि फ़ातिमा शेख़ न सिर्फ़ सहयोगी थीं बल्कि आंदोलन की रीढ़ थीं।
फ़ातिमा शेख़ को याद करना जरूरी
इतिहास ने उन्हें हाशिये पर डाल दिया। क्योंकि, वह साबित करती हैं कि कौम, मज़हब और जात-पात से ऊपर उठकर तालीम का हक़ सबको मिलना चाहिए, और क्योंकि भारत की तालीमी क्रांति सिर्फ़ एक फुले दंपति की नहीं, बल्कि फ़ातिमा जैसी अनगिनत गुमनाम औरतों की कहानी है।
