नई दिल्ली : पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने एक वरिष्ठ अधिवक्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता पश्चिम बंगाल के वास्तविक निवासी प्रतीत होते हैं। साथ ही अदालत ने संबंधित अपीलीय न्यायाधिकरण को मामले का शीघ्र निस्तारण करने का निर्देश दिया है।
मामला 75 वर्षीय एक अधिवक्ता से जुड़ा है, जिनका नाम विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटा दिया गया था। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि वह लगभग 50 वर्षों से वकालत कर रहे हैं और एसआईआर प्रक्रिया से पहले वैध मतदाता के रूप में पंजीकृत थे। नाम हटाए जाने के बाद उन्होंने अपीलीय न्यायाधिकरण में अपील दायर की थी, लेकिन लंबे समय तक उस पर कोई निर्णय नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर याचिकाकर्ता पश्चिम बंगाल के वास्तविक निवासी दिखाई देते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को मतदाता सूची से जुड़े विवादों के समाधान के लिए उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया और व्यवस्था की जानकारी है। हालांकि, अदालत ने मामले के गुण-दोष पर विस्तृत टिप्पणी करने से परहेज किया और मामले को नियमानुसार आगे बढ़ाने पर जोर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए अपीलीय न्यायाधिकरण को निर्देश दिया कि वह मामले की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर करे और संभव हो तो दो महीने के भीतर निर्णय सुनाए। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता वर्ष 1977 से मुर्शिदाबाद में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत हैं और उनका नाम एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से हटाया गया था।
विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और संशोधन को लेकर बड़ी संख्या में दावे और आपत्तियां सामने आई थीं। जानकारी के अनुसार करीब 60 लाख दावे और आपत्तियां दर्ज की गईं, जिनके निस्तारण के लिए व्यापक स्तर पर प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था की गई।
इन मामलों के समाधान के लिए पश्चिम बंगाल, ओडिशा और झारखंड के लगभग 700 न्यायिक अधिकारियों को लगाया गया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने 19 अपीलीय न्यायाधिकरण गठित किए। इन न्यायाधिकरणों की जिम्मेदारी पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और वरिष्ठ न्यायाधीशों को सौंपी गई, ताकि मतदाता सूची से जुड़े विवादों का समयबद्ध निस्तारण किया जा सके।
वर्तमान में इन अपीलीय न्यायाधिकरणों के समक्ष बड़ी संख्या में अपीलें लंबित बताई जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देश के बाद उम्मीद की जा रही है कि मतदाता सूची से जुड़े मामलों के निस्तारण की प्रक्रिया में तेजी आएगी और प्रभावित लोगों को जल्द राहत मिल सकेगी।