16 जुलाई 1968, वह तारीख जब भारतीय हॉकी को एक ऐसा नायक मिला। जिसने उस दौर में उम्मीद की लौ जलाई, जब खेल की यह विधा अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी चमक खो रही थी। धनराज पिल्लै का जन्म महाराष्ट्र के खड़की में एक तमिल परिवार में हुआ था। वह चार भाइयों में सबसे छोटे थे। उनके पिता सेना में ड्राइवर थे और मां एक गृहिणी थी।
गरीबी से पद्म श्री तक का सफर
धनराज का जीवन संघर्ष से शुरू हुआ। वह काफी गरीब थे। मगर, हमेशा सफलता से चमके। मैदान में उनकी तेज़ रफ्तार, अद्भुत ड्रिब्लिंग और विपक्षी गोलपोस्ट की ओर बढ़ते हुए उनके आक्रामक मूव्स, इन्हीं वजहों से उन्हें “हॉकी का सचिन तेंदुलकर” कहा गया। वे उस दौर के खिलाड़ी थे, जब भारतीय हॉकी खिलाड़ियों को सीमित संसाधनों, खराब व्यवस्था और कम लोकप्रियता से लड़ना पड़ता था, लेकिन धनराज कभी पीछे नहीं हटे। उन्होंने चार ओलंपिक (1992, 1996, 2000, 2004), चार वर्ल्ड कप, चार चैंपियंस ट्रॉफी और चार एशियन गेम्स खेले। ऐसा रिकॉर्ड शायद ही किसी खिलाड़ी के पास हो। वो सिर्फ एक प्लेयर नहीं, बल्कि हॉकी के लिए लड़ने वाले सिपाही थे। वे बार-बार टीम से बाहर किए गए। मगर, हर बार और मजबूत होकर लौटे। जब भी मैदान पर उतरे, तो उन्होंने देश का झंडा गर्व से लहराया।
गोल्ड जीतने पर छलके आंसू
2002 के एशियन गेम्स में जब भारत ने गोल्ड जीता, तो धनराज की आंखों में आंसू थे। यह सिर्फ जीत नहीं, बल्कि उनके संघर्षों का उत्तर था। हालांकि, उन्हें एक मलाल हमेशा रहा। “मैं ओलंपिक मेडल नहीं जीत सका।” लेकिन उन्होंने कहा, “अब सारे मलाल मिट गए जब मैंने भारत को टोक्यो ओलंपिक में ब्रॉन्ज़ जीतते देखा।”
अब युवाओं को बना रहे हैं खिलाड़ी
आज धनराज पिल्लै मुंबई में एक हॉकी अकादमी खोलने की तैयारी कर रहे हैं। उनके पास संसाधन नहीं, लेकिन सपना है। वे एक अनूठे अभियान से फंड जुटा रहे हैं। मुंबई से खाली प्रिंटर कार्ट्रिज इकट्ठा करके उन्हें यूरोपीय रीसायक्लिंग कंपनी को बेचने की योजना बना रहे हैं। यह पहल बताती है कि असली खिलाड़ी मैदान से रिटायर हो सकता है, देश की सेवा से नहीं।
