लेखक मुहम्मद साजिद
“कारगिल विजय दिवस” सिर्फ एक तारीख़ नहीं, बल्कि भारत के उन जवानों की कुर्बानी की याद है। जिन्होंने अपनी जान देकर देश की सरहदों की हिफ़ाज़त की। उन्हीं शहीदों में से एक नाम है राजपूताना राइफल्स के जांबाज़ अफ़सर कैप्टन हनीफ उद्दीन का।
तुरतुक की बर्फ़ीली चोटियों पर जंग
साल 1999, कारगिल की ऊँचाइयाँ… 18,000 फीट से ऊपर, सांस लेना भी मुश्किल और चारों तरफ़ दुश्मन की नज़रों का ख़तरा। कैप्टन हनीफ अपनी टुकड़ी के साथ “ऑपरेशन थंडरबॉल्ट” को लीड कर रहे थे। 4 और 5 जून की रात उन्होंने दुश्मन की पोस्ट पर कब्ज़ा किया, लेकिन 6 जून 1999 को हालात बेहद कठिन हो गए। दुश्मन की ताबड़तोड़ गोलीबारी और बमबारी जारी थी। गोला-बारूद ख़त्म हो चुका था… लेकिन हौसला ज़िंदा था। कैप्टन हनीफ ने आख़िरी सांस तक मोर्चा संभाला और मातृभूमि पर जान न्यौछावर कर दी।
मां को आखिरी बार बेटे का चेहरा देखने को 43 दिन करना पड़ा इंतज़ार
शहादत के बाद सबसे दर्दनाक पल जब आया, तो कैप्टन हनीफ की मां हेमा अज़ीज़ (जो खुद आर्म्ड फोर्सेज एंटरटेनमेंट विंग में 18 साल तक काम कर चुकी हैं) को बेटे की शहादत की ख़बर तो मिली, लेकिन पार्थिव शरीर नहीं मिला, लगातार चल रही जंग और दुर्गम रास्तों की वजह से परिवार को 43 दिनों तक अपने बेटे की आख़िरी झलक का इंतज़ार करना पड़ा। हेमा अजीज ने उस वक्त मीडिया को बताया था कि”हर कुछ दिनों में हमें फ़ोन आता कि फायरिंग थम गई है… मौसम साफ़ है… लेकिन मेरा हनीफ फिर भी घर नहीं लौटा।”
संगीत से किया सैनिक का सफ़र
दिल्ली में 23 अगस्त,1974 को जन्मे हनीफ उद्दीन संगीत और कला से जुड़े परिवार से आते थे। उनकी मां कथक केन्द्र और संगीत नाटक अकादमी से जुड़ी रही हैं। हनीफ भी एक बेहतरीन गायक थे, कॉलेज में हमेशा दोस्तों का मनोबल गीतों से बढ़ाते, लेकिन उन्होंने संगीत को शौक़ तक सीमित रखा और अपना जीवन देश की सेवा को समर्पित कर दिया। 1997 में राजपूताना राइफल्स की 11वीं बटालियन में कमीशन पाकर वे सीधे सियाचिन जैसी कठिन पोस्टिंग पर पहुँचे। जनरल वी. पी. मलिक ने अपनी किताब “Kargil: From Surprise to Victory” में लिखा है कि कारगिल के हर सेक्टर में भारतीय जवानों ने “अद्वितीय साहस और बलिदान” दिखाया। कैप्टन हनीफ की वीरगाथा इसका जीवंत उदाहरण है, जिन्होंने दुश्मन की गोलीबारी में भी पीछे हटने से इंकार कर दिया।
युवाओं के लिए प्रेरणा, गौरव और ग़म की दास्तां
कैप्टन हनीफ सिर्फ़ एक सैनिक नहीं बल्कि एक बेटा, एक गायक और लाखों युवाओं की प्रेरणा थे। उनकी मां आज भी कहती हैं, “हनीफ चला गया, लेकिन उसने मेरी छाती को गर्व से चौड़ा कर दिया। वो सिर्फ़ मेरा बेटा नहीं था, पूरे हिंदुस्तान का बेटा था।
