मैं महामहिम की बेटी हूं…, जब रज़िया सुल्ताना ने दुपट्टा लहराकर दिल्ली की गद्दी संभाली!
लेखक मुहम्मद साजिद
रज़िया सुल्ताना सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि भारत की पहली महिला सुल्तान के रूप में न्याय, समानता और साहस की प्रतीक हैं। सन 1206 ई. में जब चंगेज़ ख़ाँ की सेनाएं मध्य एशिया में तबाही मचा रही थीं, दिल्ली सल्तनत के सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश के घर एक बेटी का जन्म हुआ, रज़िया बिंत इल्तुतमिश। यह वही दौर था, जब दिल्ली में क़ुतुब मीनार का निर्माण पूरा हुआ और इल्तुतमिश ने शासन को संगठित स्वरूप दिया। इतिहासकार मिन्हाजुस सिराज जुज़जानी अपनी प्रसिद्ध कृति ‘तबक़ात-ए-नासिरी’ में लिखते हैं- “दिल्ली पर राज करने वाले शासकों में इल्तुतमिश जैसा उदार और न्यायप्रिय सुल्तान कोई नहीं था। उसने अपनी बेटी रज़िया को राजकाज की कला सिखाई, और जनता के प्रति जिम्मेदारी का बोध कराया।”
जब सुल्तान ने बेटी को उत्तराधिकारी घोषित किया
जब इल्तुतमिश वृद्ध हुए, उन्होंने अपने दरबारियों से कहा कि उनके पुत्र शासन योग्य नहीं हैं। “मेरे बेटे ऐय्याशी और सुख-सुविधाओं में डूबे हैं, उनमें से कोई भी राजकाज संभालने के योग्य नहीं। मेरी बेटी रज़िया उनमें सबसे सक्षम है।”इस निर्णय ने दिल्ली दरबार में हलचल मचा दी। उस दौर में यह असंभव था कि एक महिला सिंहासन पर बैठे। मगर, इल्तुतमिश ने लिखित रूप से रज़िया को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया, जो उस समय के लिए एक क्रांतिकारी निर्णय था।
भाई रुक्नुद्दीन की नाकाम हुकूमत और शाह तुर्कन की अय्याशी
इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद दरबारियों ने उनकी अंतिम इच्छा की अवहेलना करते हुए रज़िया की बजाय उसके सौतेले भाई रुक्नुद्दीन फिरोज़ को सुल्तान बना दिया। रुक्नुद्दीन शासन छोड़कर ऐय्याशी में डूब गया, जबकि उसकी माँ शाह तुर्कन ने सत्ता अपने हाथ में लेकर निर्दयता दिखाई। इतिहासकार अब्राहम इराली (The Age of Wrath) लिखते हैं, “रुक्नुद्दीन ने सत्ता की पूरी ज़िम्मेदारी अपनी माँ पर छोड़ दी, जिसने हरम में अपने शत्रुओं को मरवाया और राज्य में अराजकता फैला दी।”
“मैं महामहिम की बेटी हूं”,रज़िया का ऐतिहासिक विद्रोह
जब देशभर में विद्रोह भड़का, जनता ने रज़िया का साथ दिया। 14वीं सदी के इतिहासकार अब्दुल मलिक इसामी के अनुसार “रज़िया ने महल की खिड़की से अपना दुपट्टा लहराते हुए कहा, ‘मैं महामहिम की बेटी हूं। मुझे ही उनका उत्तराधिकारी चुना गया था। कुछ समय के लिए मुझे गद्दी दीजिए, अगर मैं असफल रहूं, तो किसी और को सौंप दीजिए।’”इसके बाद जनता और गवर्नरों ने रज़िया का समर्थन किया। नवंबर 1236 में वह दिल्ली की पहली महिला सुल्तान बनीं।
पर्दा तोड़ा, दरबार संभाला
रज़िया ने परंपरा तोड़कर पर्दा छोड़ा और खुले दरबार में शासन करना शुरू किया। उन्होंने खुद सेना का नेतृत्व किया, प्रशासनिक सुधार किए, और न्याय व्यवस्था को मजबूत किया। उनके शासनकाल में सिक्कों पर “अल-सुल्तान रज़िया बिंत इल्तुतमिश” खुदवाया गया। यह उस युग के पुरुष प्रधान समाज को चुनौती थी।
दरबारी षड्यंत्र और रज़िया का अंत
लेकिन दिल्ली का दरबार महिलाओं की शक्ति को स्वीकार नहीं कर पाया।
उनकी नीतियों से असंतुष्ट अमीरों ने षड्यंत्र रचा। पहले लाहौर के गवर्नर कबीर ख़ाँ ने विद्रोह किया, बाद में मलिक अल्तूनिया से रज़िया का संघर्ष हुआ। इतिहासकार याह्या सरहिंदी के अनुसार “रज़िया और अल्तूनिया दोनों को पकड़कर मौत के घाट उतार दिया गया।”वहीं इब्न बतूता लिखते हैं कि “कैथल के एक किसान ने उनके गहनों के लालच में उनकी हत्या कर दी।”रज़िया ने केवल तीन वर्ष और छह दिन शासन किया, पर उनका प्रभाव आज भी कायम है।
उन्हें दिल्ली के तुर्कमान गेट के पास दफनाया गया, जहाँ आज भी उनकी मजार न्याय और साहस की निशानी बनी है। मिन्हाजुस सिराज जुज़जानी ने लिखा “रज़िया सुल्तान एक बुद्धिमान, न्यायप्रिय और उदार शासक थीं। उनके पास एक आदर्श शासक के सारे गुण थे, बस उनका एक ही दोष था, कि वह पुरुष नहीं थीं।”रज़िया सुल्तान ने उस दौर में साबित किया कि नेतृत्व लिंग से नहीं, योग्यता से तय होता है। उन्होंने भारत के इतिहास में वह अध्याय लिखा, जहाँ एक औरत ने ताज नहीं माँगा, बल्कि अपने हक़ का ताज खुद हासिल किया।
