पति बदरुद्दीन तैयबजी राजनीतिक क्रांतिकारी और विचारों के थे योद्धा
मुल्क (देश) की आजादी के लिए लाखों क्रांतिकारियों के साथ ही पूरे- पूरे खानदानों ने कुर्बानियां दी हैं। इसके बाद ही मुक्का को आजादी मिली है। इसलिए हर हिन्दुस्तानी को जंग-ए- आजादी के नायकों की कुर्बानी को जानना जरूरी है। इसी में एक परिवार है बदरुद्दीन तैयबजी का, बदरुद्दीन तैयबजी (1844–1906) पहले मुस्लिम बैरिस्टर थे, जिन्होंने इंग्लैंड में वकालत की पढ़ाई की, और 1887 में मद्रास कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता की। यहां पहली बार कोई मुस्लिम नेता कांग्रेस अध्यक्ष बना। वह कांग्रेस के उन नेताओं में से थे, जो हिंदू-मुस्लिम एकता पर ज़ोर देते थे। उनका मानना था कि आज़ादी की लड़ाई केवल एक धर्म या समुदाय की नहीं, बल्कि पूरे भारत की साझी जंग है। वह बॉम्बे हाई कोर्ट के पहले भारतीय मुस्लिम जज बने, और बाल गंगाधर तिलक को जमानत दी। उनके पूरे परिवार ने भी स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्र-निर्माण में अहम योगदान दिया। उनकी पत्नी सुरैया तैयबजी को भारतीय तिरंगे के डिजाइन, और अशोक चक् श्रेय दिया जाता
राष्ट्रीय ध्वज आजादी, इंक़लाब और इत्तेहाद की पहचान
भारत का राष्ट्रीय ध्वज सिर्फ़ कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि आजादी, इंक़लाब और इत्तेहाद (एकता) की पहचान है। तिरंगे पर 1.4 अरब हिंदुस्तानी फख्र करते हैं, उसके पीछे एक नाम है, हैदराबाद की सुरैया तैयबजी का। 1947 में जब झंडा समिति बनी, तो यह साफ़ था कि कांग्रेस का पार्टी झंडा ही राष्ट्रध्वज नहीं हो सकता तभी सुरैया तैयबजी ने सुझाव दिया कि चरखे की जगह अशोक काल का धर्म चक्र होना चाहिए। यह विचार सिर्फ़ एक प्रतीक का बदलाव नहीं था, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए धर्मनिरपेक्ष और सर्वधर्म समभाव का संदेश था। नेहरू और गांधी ने इसे स्वीकार किया और यही डिज़ाइन 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा में मंज़ूर हुआ।
कपड़े और रंगों का किया चुनाव
जंग-ए-आजादी की नायिका सुरैया तैयबजी ने तिरंगे का न सिर्फ़ डिज़ाइन बनाया, बल्कि सही कपड़े और रंगों का चुनाव किया। पहली प्रति की सिलाई भी उन्हीं की देखरेख में हुई। इसी ध्वज को स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को भेंट किया गया, और इसके बाद आधी रात को लाल किले पर फहराया गया।
गुमनाम नायकों को याद करना हर हिन्दुस्तानी की जिम्मेदारी
जंग-ए-आजादी के गुमनाम नायकों को याद करना हर हिन्दुस्तानी की जिम्मेदारी है। मगर, आज भी स्कूल की किताबों में सुरैया तैयबजी का नाम शायद ही पढ़ाया जाता है। इतिहासकारों का मानना है कि यह योगदान जानबूझकर हाशिये पर डाल दिया गया, लेकिन सच यह है कि अगर सुरैया तैयबजी का प्रस्ताव न होता, तो शायद हमारा राष्ट्रीय ध्वज आज भी पार्टी झंडे जैसा दिखता। तिरंगा सिर्फ़ एक झंडा नहीं, बल्कि क़ौम की रूह (nation’s soul) है। यह हमें याद दिलाता है कि भारत की आज़ादी की लड़ाई सिर्फ़ तलवार और बंदूक से नहीं, बल्कि विचारों और प्रतीकों से भी लड़ी गई, और उन प्रतीकों को रूप देने में सुरैया तैयबजी जैसी शख्सियतों का हाथ रहा, जिनका नाम आज भी ज़्यादातर लोग नहीं जानते।
