नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दिव्यांग व्यक्तियों की गरिमा की रक्षा के लिए केंद्र सरकार से सख्त कानून बनाने का सुझाव दिया। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि ऐसा कानून बनाया जाए, जिसमें दिव्यांग या दुर्लभ अनुवांशिक बीमारी से पीड़ित लोगों का मजाक उड़ाना या अपमान करना अपराध हो, ठीक वैसे ही जैसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) अधिनियम में है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की बेंच ने केंद्र से पूछा, “एससी/एसटी अधिनियम जैसी कड़ी कार्रवाई दिव्यांगों के लिए क्यों नहीं हो सकती?” कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी की गरिमा पर हास्य करना अस्वीकार्य है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से कहा कि किसी की गरिमा की कीमत पर मजाक नहीं हो सकता। कोर्ट ने इसके साथ ही कहा कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री को नियंत्रित करने के लिए एक स्वतंत्र और स्वायत्त संस्था की आवश्यकता है।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को दिशा-निर्देश जारी करने के लिए कहा
कोर्ट ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से कहा कि दिव्यांगों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी और उपहास पर दिशानिर्देश तैयार करके सार्वजनिक चर्चा के लिए जारी किए जाएँ। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चार हफ्ते बाद फिर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया।
एसएमए क्योर फाउंडेशन की याचिका पर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट एसएमए क्योर फाउंडेशन की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह संस्था स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) से पीड़ित लोगों के लिए काम करती है। याचिका में ‘इंडियाज गॉट टैलेंट’ के होस्ट समय रैना और अन्य सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स द्वारा दिव्यांगों का मजाक उड़ाने की शिकायत की गई थी।
रैना और अन्य कॉमेडियनों को दिए निर्देश
कोर्ट ने रैना और अन्य कॉमेडियनों को भविष्य में सावधान रहने के निर्देश दिए। बेंच ने कहा कि वे महीने में कम से कम दो कार्यक्रम आयोजित करें, जिनमें दिव्यांग व्यक्तियों की सफलता की कहानियां बताई जाएँ और उनके उपचार के लिए फंड जुटाया जाए, विशेषकर SMA से पीड़ित लोगों के लिए। कोर्ट ने इसे सामाजिक दंड करार दिया और अन्य सजाओं से राहत दी।
