लेखक
मुहम्मद साजिद
1942, अगस्त की चिलचिलाती गर्मी में, जब महात्मा गांधी और पंडित नेहरू सहित पूरा कांग्रेस नेतृत्व अंग्रेज़ों की जेल में कैद था, तब गोवालिया टैंक मैदान (आज का आज़ाद मैदान) में एक दुबली-पतली महिला खड़ी थी, उसका नाम था अरुणा आसफ अली। उनके सामने पुलिस की बंदूकें थीं, धारा 144 लगी हुई, और सभा गैरकानूनी घोषित हो चुकी थी, लेकिन उनका साहस कानून से नहीं डरा। उन्होंने आगे बढ़कर कांग्रेस का झंडा फहराया और भारत छोड़ो आंदोलन का बिगुल बजा दिया। “They called her the Grand Old Lady of the Independence Movement, but she was the youngest soul in the crowd.”GNS Raghavan की जीवनी के मुताबिक 16 जुलाई 1909 को हरियाणा के कालका में जन्मीं अरुणा गांगुली ब्राह्मण बंगाली परिवार से थीं। उन्होंने नैनीताल और लाहौर में शिक्षा प्राप्त की और शिक्षिका बनीं। 1928 में उन्होंने प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और बाद में अमेरिका में भारत के पहले राजदूत बने आसफ अली से विवाह किया। सिर्फ यही नहीं, उन्होंने समाज की परंपराओं को चुनौती देते हुए न केवल अंतर्जातीय विवाह किया, बल्कि अपनी वैचारिक स्वतंत्रता को भी कभी गिरवी नहीं रखा।
जब ‘इंकलाब’ गूंजा, औरतों की आवाज़ में
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भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान, अरुणा आसफ अली ने ‘इंकलाब’ नाम की पत्रिका का संपादन किया और ऊषा मेहता के साथ गुप्त कांग्रेस रेडियो से अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ प्रचार किया। यह सिर्फ पत्रकारिता नहीं थी। यह एक आंदोलन था, कलम और माइक से आज़ादी की लड़ाई लड़ने का। ऊषा मेहता को उद्धृत करते हुए कहा था कि “हमारा रेडियो ‘ऑल इंडिया रेडियो’ नहीं, ‘एंटी इंडिया रेडियो’ था।”
तीन साल भूमिगत, फिर भी पुलिस की पकड़ से बाहर
वो तीन साल तक भूमिगत रहीं।ब्रिटिश पुलिस ने उनकी संपत्ति जब्त कर ली, लेकिन उन्हें पकड़ न सकी। उन्होंने राम मनोहर लोहिया और दूसरे समाजवादियों के साथ मिलकर संगठित विद्रोह को दिशा दी। जब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने उन्हें आत्मसमर्पण की सलाह दी, तो उन्होंने कहा “समर्पण दुर्बलता का प्रतीक होगा, लोग समझेंगे हमने उन्हें धोखा दिया है।”
1997 में मरणोपरांत ‘भारत रत्न’
आज जब भारत की बेटियां चाँद और संसद तक पहुँच रही हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि उस राह में अरुणा जैसी महिलाओं ने पत्थर हटाए थे। 1997 में उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। वे दिल्ली की पहली महिला मेयर बनीं, और उन्होंने कांग्रेस तथा वामपंथी आंदोलनों के बीच वैचारिक सेतु भी बनाया, जब आज महिलाएं लोकतंत्र और नेतृत्व में भागीदारी का दावा करती हैं, उन्हें अरुणा आसफ अली की उस तस्वीर को याद रखना चाहिए, जो एक क्रांतिकारी के तौर पर झंडा फहराती है, एक पत्रकार के रूप में सत्ता से टकराती है, और एक नागरिक के तौर पर अपना सब कुछ राष्ट्र को समर्पित कर देती है। उनका कहना था कि”क्योंकि एक झंडा फहराने से सिर्फ कपड़ा नहीं लहराता, बल्कि एक युग की चेतना जागती है”
क्रांति की ध्वजवाहिका, विचार की वाहक
अरुणा आसफ़ अली का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सिर्फ एक नायिका के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी विचारक, पत्रकार और सेतु के रूप में दर्ज है, जिन्होंने आंदोलन और राजनीति के बीच विचारधारा की मिट्टी को जोड़े रखा। मोहित सेन अपनी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘A Traveller and the Road’ में लिखते हैं कि “सोच ये थी कि नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस और अजय घोष के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी के बीच वैचारिक और राजनीतिक संपर्क कायम किया जाए। अरुणा ने अपने जीवन का बड़ा समय ‘पैट्रियट’ जैसे अख़बार और ‘लिंक’ जैसी पत्रिका के प्रकाशन में लगाया।” यह पत्रकारिता केवल समाचार देने का माध्यम नहीं थी। यह उस दौर में विचारों का पुल बनाना था, जब नेहरू और भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के बीच खाई गहरी होती जा रही थी। ‘पैट्रियट’ और ‘लिंक’ के माध्यम से अरुणा न सिर्फ खबरों की प्रस्तुति करती थीं, बल्कि वैचारिक बहस का मंच तैयार करती थीं।
‘लिंक’: जब साप्ताहिक पत्रिका बन गई वामपंथ की सबसे बड़ी आवाज़
सेन अपनी किताब में आगे लिखते हैं कि “जैसे-जैसे वक़्त बीतता गया, ‘लिंक’ वामपंथियों की प्रमुख पत्रिका बन गई। उस ज़माने में वो अपनी तरह की सर्वश्रेष्ठ साप्ताहिक पत्रिका थी, जिसमें कृष्ण मेनन, के.डी. मालविय, फ़िरोज़ गांधी और यहाँ तक कि जवाहरलाल नेहरू तक का योगदान हुआ करता था। इस पूरे प्रयास में अरुणा की सबसे अधिक मदद की बीजू पटनायक ने”। यहाँ पत्रकारिता, राजनीति और विचारधारा एक साथ चलते हैं। अरुणा के नेतृत्व में ‘लिंक’ ने भारतीय समाज में हो रहे सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों को न केवल रेखांकित किया, बल्कि सत्ता और जनसंघर्ष के बीच एक बौद्धिक संवाद भी कायम किया।
एक विचारधारा की सच्ची साधिका
आज़ादी के बाद अरुणा आसफ़ अली कांग्रेस से अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी और फिर कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य बनीं। 1956 में जब ख्रुश्चेव ने स्टालिन की आलोचना की, तो उन्होंने सैद्धांतिक असहमति के चलते पार्टी से दूरी बना ली, लेकिन अपने भीतर के वामपंथ को कभी नहीं छोड़ा अरुणा को भारत में वामपंथी चेतना और राष्ट्र निर्माण के बीच की कड़ी के रूप में देखा गया। वो नेहरू और कम्युनिस्टों के बीच वैचारिक संवाद की सूत्रधार रहीं। अरुणा आसफ़ अली के साहस और वैचारिक प्रतिबद्धता को न केवल भारत, बल्कि दुनिया ने भी सम्मानित किया। 1965 में लेनिन शांति पुरस्कार और ऑर्डर ऑफ़ लेनिन, 1992 में पद्म विभूषण और 1997 में मरणोपरांत भारत रत्न (भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान) मिला। यह सम्मान उनके लिए नहीं, बल्कि उस चुपचाप विचारशील, कर्मनिष्ठ और नैतिक नेतृत्व के लिए था। जिसकी आज राजनीति में सर्वाधिक कमी है।
